Sunday, November 11, 2018

बन्नो बुआ

हमारी बन्नो बुआ थी कुछ हट के! बिलकुल स्टाइलिश. हर चीज़ में एकदम अप -टू-डेट, फिर चाहे वो लेटेस्ट गॉसिप हो, फ़िल्मी ज्ञान, फ़ैशन या फिर बातें. बुआ जैसी पूरे मोहल्ले में कोई और नहीं थी, वो थी ही इतनी निराली! इधर- उधर गप्पें हाँक कर समय बर्बाद करना उनकी विशेष हॉबी थी, जिसकी वजह से वो अक्सर दादी से ख़ूब डाँट खाती.” कम्बख़्त सारे समय सहेलियों के साथ बातें करती रहती है, घर के काम क्या ख़ाक सीखेगी. आने दो घर आज उसकी टाँगे तोड़ूँगी!” हमें बहुत मज़ा आता जब बुआ को डाँट पड़ती थी. वो मज़ा हमें महंगा बहुत पड़ता और ख़ामियाज़ा भी भुगतना पड़ता! डाँट खाने के बाद बुआ दनदनाती हुई कमरे में आती और आते ही आवाज़ लगाती,“ पिंटू मेरे लिए एक ग्लास ठंडा पानी तो ला और फिर आ कर मेरा सिर दबाना. कुछ काम नहीं करता तू आजकल, निकम्मा कहीं का!
 हैं, ये क्या? दादी का ग़ुस्सा मेरे ऊपर!
बन्नो बुआ के मिज़ाज ही निराले थे- उनके कमरे में सिंगार मेज़ के ऊपर तरह - तरह का समान रखा रहता था. पांड्ज़ टैल्कम पाउडर, अफ़ग़ान स्नो, पर्फ़्यूम, चूड़ियों का डिब्बा, रंग- बिरंगी काँच के बोतलें, मेकअप का समान और ना जाने क्या -क्या.हमें टेबल के पास जाना बिलकुल भी अलाउड नहीं था. उसके आस-पास तो हम पर भी नहीं मार सकते थे. 
वो बुआ की फ़ेवरेट जगह थी और हमारे लिए नो एंट्री ज़ोन! कभी- कभी जान जोखिम में डाल, अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए और इतने सारी इंट्रेस्टिंग वस्तुओं को देखने के लिए ग़लती से कभी उधर कूच भी कर जाते तो बुआ की ऐसी फटकार पड़ती की क्या बताऊँ. बुआ के कमरे के बुक शेल्फ़ में किताबें कम और फ़िल्मी मैगज़ीन ज़्यादा दिखती थी, जो वो अपनी सहेलियों के साथ अक्सर इक्स्चेंज भी करती. दादी की नज़रे बचा बुआ कभी- कभी अंग्रेज़ी के रोमांटिक नॉवल यानी “ मिल्ज़ एंड बून” भी पढ़ती थी.उनको वो ब्राउन काग़ज़ चढ़ा के रखती थी ताकि सबको लगे की वो अपने कोर्स की किताबें पढ़ रही हैं.
पर कहते है ना झूठ के पैर नहीं होते! एक दिन जब बुआ अपनी सहेलियों के साथ बाहर गयी हुई थी दादी ने डिसाइड किया कि बुआ के कमरे की स्प्रिंग क्लीनिंग होनी चाहिये. फिर क्या था एक- एक चीज़ निकाल कर सफ़ाई हुई। धूल-धूसरित किताबें को तो जैसे ऑक्सिजन मिल गया हो, चप्पल, सैंडल और जूतियाँ को भी ताज़ी हवा नसीब हो गयी. कमरे की सारी चीज़ें दादी को थैंक यू बोल रही थी मानो! तभी दादी की तेज़ नज़र पड़ी ब्राउन पेपर चढ़ी किताबों पर. तुरंत बोली,” ऐ कमला पकड़ा तो किताबें, ज़रा देखूँ कॉलेज में क्या पढ़ रहें हैं आजकल .”
पहली किताब आते ही दादी के चेहरे का रंग ही बदल गया, फिर दूसरी ने इक्स्प्रेशन बदल दिया और देखते ही देखते दादी ग़ुस्से से आग- बबूला हो गयी.” आने दो घर बन्नो को, आज ऐसी धुलाई करूँगी याद रखेगी.यही सब पढ़ाते है कॉलेज में। कल से कोई ज़रूरत नहीं है कॉलेज जाने की !”
शाम को जब बन्नो बुआ घर पर आयी तो डाँट के बदल ऐसे गरजे और बरसे की उसके बाद बुआ ने किताबों पर कवर चढ़ना ही छोड़ दिया और बुआ की 'मिल्ज़ एंड बून' वन्स इन आ ब्लू मून हो गयी!

Wednesday, November 7, 2018

कवर स्टोरी

स्कूल और घर में कोई ना कोई हंगामा लगा ही रहता था- बिलकुल ऐक्शन फ़िल्मों की तरह. मज़ा तो उस दिन आया जिस दिन बंटू उसको ले कर आया.आप सोच नहीं सकते कितना हंगामा मच गया था पूरी क्लास में! सब बच्चे उस की एक झलक देखना चाहते थे. सब लोगों में खुसर- पुसर हो रही थी, लड़कियों में गुपचुप बातें हो रही थी और माहौल कुछ अलग ही लग रहा था. तभी कोई आवाज़ आयी, “आज आने दो शर्मा मैडम को इस बंटू की शिकायत करेंगे, ऐसी चीज़ें कोई स्कूल में लाता है ?” पीछे पलट कर देखा तो बबली अपनी सहलियों से कह रही थी. अरे भाई ऐसा क्या भूकम्प आ गया इस मरियल क्लास में, जो सब उछल रहे थे!
मेरी और जग्गू की समझ से बिलकुल परे था ये हंगामा. भई, हम तो बंटू की लीग में आते ही नहीं थे- कहाँ वो और कहाँ हम! वो तो हमेशा नई- नई चीज़ें लाता था जो उसके लिए उसकी लंदन वाली मौसी और कनाडा वाले मामा भेजा करते थे. जानते हैं, वो भी फ़ोरेन कंट्री घूम कर आया था पिछले साल! उसके पिताजी उसे नेपाल ले गए थे और एक हमारे है, जिनसे हमारी बात करने की हिम्मत ही नहीं होती.हमारे सरसों के तेल से चमकाए बालों की महक की वजह से लड़कियाँ क्या लड़के भी एक हाथ का फ़ासला बनाए रखते हैं हमसे. कितनी बार माँ को समझाया पर हमारी बात की तो कोई अहमियत ही नहीं है. चलिए जाने दीजिए, लौटते हैं बंटू के कांड पर...
हमने बहुत बारी उसके डेस्क तक जाने की कोशिश की पर हमारे हाथ सिर्फ़ नाकामी ही लगी. क्लास में बंटू अपने चेलों के साथ घिरा बैठा रहा और हम ये सोचते रहे के कैसे जा कर देखे की वो क्या लाया है. उसके ग्रूप के बच्चे ख़ूब मज़े से उसके साथ बैठ कर देख रहे थे. हम जैसे- तैसे हिम्मत करके उसके डेस्क पर पहुँच गए और हमारी नज़र जैसे ही उस पर पड़ी तो हम भौंचके रह गए. “ अबे यह क्या ले आया? तेरी तो आज ख़ूब धुलाई होगी!”, मैंने उसे बोला. उसके पास थी प्लेबॉय मैगज़ीन, जिसमें लड़कियों के अश्लील तस्वीरें होती है! 
सच जानिये हमारे पैरों तले ज़मीन ही खिसक गयी और बंटू की हिम्मत देखिए की वो ऐसी मैगज़ीन स्कूल ले आया. कितना दबंग! हमारे लिए तो वो कुछ टाइम के लिए रोल मॉडल ही बन गया था. 
आज से पहले किसी ने इतनी हिम्मत नहीं करी थी. हमें तो कवर की एक झलक ही मिली. इससे पहले हम आगे बढ़ कुछ और देख पाते ठाकुर सर ने क्लास में एंट्री मार दी. हम रिवर्स गीयर में पीछे हो लिए और चुगलख़ोर लड़कियाँ फ़ुल स्पीड में सर के पास!
फिर आगे की क्या कहूँ, भयानक नज़ारा था! सर डाइव मार कर बंटू के डेस्क पर और इस से पहले वो मैगज़ीन को  छिपा पता, मैगज़ीन सर के हाथ में. फिर क्या था, दे-दना-दन-दे! उसकी ऐसे धुलाई हुई की वो और उसका चेहरा किसी मैगज़ीन के कवर पेज पर क्या अंदर के पेज में भी छपने के लायक ना रहा.

Saturday, November 3, 2018

गाथा गुसलखाने की

हम गुसलखाने में घुसे नहीं, दादी का प्रोग्राम तुरंत चालू हो जाता था।“ ओ, पिंटू अंदर जा के ब्याह मत जाइयो, फटफट नहा कर आना!” अब दादी को कैसे समझाते की सर्दी के मौसम में गरम पानी से स्नान करने का मज़ा कुछ अलग ही होता है। गरम पानी से निकलती हुई स्टीम हमारे मकड़ी के जाले से सजे और  धूल धूसरित गुसलखाने को थोड़ा- थोड़ा स्टीम रूम बना देती! वही कोने में लकड़ी के त्रिकोण पर रखा सरसो का तेल,संसिलक शैम्पू, हमाम साबुन, नयसिल पाउडर और पापा का शेविंग का सामान हमारे कारनामों के मूक दर्शक होते। हम भी पूरी प्लानिंग के साथ अंदर जाते।अब अंदर जाएँगे और थोड़ा बहुत वक़्त भी लगाएँगे और अपनी बेसुरी आवाज़ में मोहम्मद रफ़ी साहब या फिर किशोर दा के नग़मे भी गाएँगे।
हमारी ख़ुशी से कोई ख़ुश नहीं होता था.बन्नो बुआ को तो मौक़ा चाहिए होता था हमें दादी से डाँट पड़वाने का. जैसे ही तौलिया ले कर आता वैसे ही बन्नो बुआ शुरू हो जाती, “ पिंटू अंदर जा कर बैठ मत जाना जल्दी- जल्दी करना, मुझे बबिता के साथ बाज़ार जाना है.” छाछ बोले तो बोले, छलनी भी! पर हम कौन से सुनने वालों में से थे, बात सुनी भी और नहीं भी।
बाहर आँगन में बड़ी ऐल्यूमिनीयम के जम्बो पतिले में पानी गरम होता और वहाँ दादी की हिदायतों की लिस्ट लम्बी होती। ये तो नॉट हैपनिंग था, पर क्या करे दादी से पंगे लेना बेहद ख़तरनाक काम था। कितनी बार मन होता की दादी को बोल दे की ये पानी है राशन नहीं, पर अब जो मिल जाए उसमें ही संतुष्ट होने की भरपूर कोशिश  करते।
लेकिन, गुसलखाने में अंदर जाकर वो ऊधम उतारते की घरवाले परेशान हो जाते।अब यही तो वो जगह थी जहाँ हम अपनी मनमानी कर सकते थे।दादी की कंजूसी की वजह से हम काफ़ी क्रीएटिव हो गए थे और एक बालटी गरम पानी को दो में कैसे बदला जाता है वो हमें अच्छे से आता था! कभी- कभी तो एक का ढाई भी कर लेते थे!
अभी पानी की ठीक से जाँच -पड़ताल भी नहीं करी होती, इतने में आवाज़ें आनी शुरू हो जाती। “ ज़्यादा देर गरम पानी से अपना शरीर मत सेंकना काला हो जाएगा, कोई छोरी ना ब्याह करेगी तुझ से!” इक्स्क्यूज़ मी दादी, मैं कोई डबल रोटी का स्लाइस नहीं हूँ, जो ज़्यादा टोस्ट हो जाएगा और शादी उसके लिए बहुत छोटा। ये बातें दादी को बोलने की हिम्मत नहीं होती और सब दिल के एक कोने में रह जाती।
चाहे दादी आवाज़ें लगती या माँ प्यार से पुकारती, गुसलखाने में जा कर तो अपनी मस्ती चालू हो जाती।अच्छे से गरम पानी से अपनी सिकाई करके जब बाहर आता तो दादी की डाँट, बुआ की फटकार, माँ की मार और पिताजी की पिटाई मेरा इंतज़ार कर रही होती!
आज गरम पानी अन्लिमटेड है पर बचपन का वो बेफ़िक्री वाला टाइम नहीं है।

Sunday, July 15, 2018

बचपन का स्वाद

अब वैसे तो बन्नो बुआ हमारी फ़ेवरेट नहीं थी पर ऐसे मौक़े पर वो हमारा साथ ख़ूब देती थीं। हम बच्चों के साथ वो भी बच्चा बन जाती थीं। हफ़्ते का सबसे स्पेशल दिन होता था वो जब हम सब शराफ़त से अपना स्कूल का काम कर लेते थे, माँ की रसोई के कामों में मदद कर देते थे और दादी से तो बिलकुल पंगे नहीं लेते थे। अब, दादी ही तो हमारे इस प्रोग्राम की फ़ंडिंग करती थी, तो फिर उनसे उलझने का कोई मतलब हो नहीं बनता था। चुपचाप जो -जो काम वे कहतीं हम कर देते थे और बेसब्री से घड़ी में सात बजने का इंतज़ार करते रहते।ऐसे मौक़े का फ़ायदा तो बन्नो बुआ भी ख़ूब उठातीं।"जल्दी जा और रचना के घर से मुझे पीली ऊन के दो गोले ला दे, वरना शाम को जाने के लिए देर हो जाएगी।" मन तो करता की ना कर दूँ पर मरता क्या नहीं करता। बुआ ने ही तो हम बच्चों को शाम को लेकर जाना है तो उन्हें भला कैसे  नाराज़ कर सकते थे।आनन- फ़ानन रचना दीदी के घर से पीली क्या नीली ऊन के भी गोले ले आता! बस उसके बाद क्या इंतज़ार की लम्बी घड़ियाँ- हम सब कभी कहीं बैठते, तो कहीं लुढ़कते और यही सोचते रहते की साथ बजने में इतने टाइम क्यों लगता है।
फिर जैसे ही सात बजते हम सब तैयार हो कर बुआ के कमरे के बाहर खड़े हो जाते। बुआ जैसे ही हमें देखतीं तो बोलती,"इतनी जल्दी आ गए, अभी तो सात भी नहीं बजे भी नहीं!" हम भी पक्के बेशर्म, अंगद के पैर के जैसे उधर ही जमे रहते।फिर सारी सवारी तैयार हो कर बुआ के संग -संग निकल पड़ती और सीधे जा कर रूकती चौरसिया चाट भंडार पर। उसकी दुकान भले ही छोटी थी पर खाने का सामान देखते ही मुँह से लार टपकने लगती थी। ये बड़े-बड़े सूजी और आटे के गोलगप्पे, करारी पापड़ी, बढ़िया मूँग दाल की पकोड़ी ,गरमागरम आलू की टिक्की और चाट, नरम-नरम भल्ले,आलू की टोकरी, फलों की चाट और ना जाने क्या-क्या। हमारे लिए तो ये कुबेर के ख़ज़ाने से कम नहीं था। अब इतना सब सामने देख कर बहुत कन्फ़्यूज़न हो जाता की क्या खायें और क्या नहीं। फिर आपस में सलाह-मशवरा करके गोलगप्पे से प्रोग्राम को शुरू करते। गोलगप्पे भी ऐसे की जितने खाओ उतने कम, दही भल्ले एक्स्ट्रा सॉफ़्ट और मीठी सोंठ से भरपूर, ख़स्ता आलू की टिक्की के साथ मिलने वाली धनिए-पुदीने की चटनी तो इतनी स्वाद की प्लेट चाटने के साथ साथ डाँट भी खाते थे हम! इतना सब चखने-खाने के बाद पेट तो भर जाता था पर नीयत नहीं। बुआ से मनुहार करके मूँग की पकोड़ियों पर ऐसे झपटा मारते जैसे की कोई शेर अपने शिकार पर पंजा मारता हो- ख़स्ता पकोड़ियाँ पर तीखी हरी चटनी और मूली का लच्छा हमारे को रिझाने के लिए बहुत था! 
कोई ऐसी चीज़ ना हो होती जो हम ना खाते -ये सोचते की अगर पेट ख़राब होगा तो बाद में देखा जाएगा अभी तो जी भर के खा लें।आज भी उन चीजों का स्वाद मुँह में आ जाता है तो बचपन की सारी बातें ताज़ा हो जाती हैं। 



Wednesday, April 4, 2018

मंगलवार का इंतज़ार

हर मंगलवार का हम बेसब्री से इंतज़ार करते थे - शायद औरों के लिए नहीं पर हमारे लिए ख़ास होता था! स्कूल से आकर हम जल्दी- जल्दी अपना होम्वर्क ख़त्म कर लेते ताकि माँ के पास कोई बहाना ना हो हमें अपने साथ ना लेकर जाने का। वैसे तो माँ कभी मना नहीं करती थी पर होम वर्क के मामले बेहद स्ट्रिक्ट थी - अगर काम नहीं करा तो मतलब हमारी हर ऐक्टिविटी निषेध। मंगलवार का दिन दादी का भी ख़ास होता था, वे भी माँ के साथ मिलकर जल्दी से खाने की सारी तैयारी कर लेती। बन्नो बुआ को भी ना चाहते हुए काम करना पड़ता, अब दादी के आगे किसी की भी नहीं चलती थी। "ज़रा जल्दी -जल्दी हाथ चला, काम के वक़्त इतनी ढीली पड़ जाती है, घूमने-फिरने में नम्बर एक।पता नहीं इसकी कामचोरी की आदत कब जाएगी!" बुआ को डाँट पड़ता देख हमें बड़ा मज़ा आता।
शाम को चार बजते ही दादी माँ को हिदायतें देना शुरू कर देती।"जल्दी- जल्दी काम निबटा लेंगे ताकि समय से पहुँच जाएँ, बच्चों को भी तैयार होने को बोल देना वरना घर से निकलने में ही तुम सब लेट हो जाओगे।" अब दादी का हुकुम सर आँखों पर।अब आप सोच रहें होंगे की कोई बहुत बड़े इवेंट के लिए हम सब तैयारी कर रहे होंगे पर उन दिनों तो ये भी एक इवेंट जैसे ही था। हम सब झटपट तैयार हो कर जाली के दरवाज़े पर लटकना शुरू कर देते। उधर दादी,माँ,बुआ सब आनन-फ़ानन अपना काम ख़त्म कर आ जाती और फिर हम सब चल पड़ते अपनी मंज़िल की और। घर से निकलते ही सबसे पहले मिलती चीकू की दादी- जो एक नम्बर की बातूनी। जहाँ दादी को देखा बस वहीं शुरू हो जाती अपने घर के किस्से-कहानियाँ सुनाने के लिए और मंगला चाची को तो अपनी बहू की बुराई करने में सबसे ज़्यादा आनंद मिलता। शिल्पा दीदी बुआ को अपनी कॉलेज की बातें सुनाती और दोनों एक दूसरे के साथ ख़ूब खुसर-पुसर करती। दीपा काकी और माँ अपनी घर -गृहस्थी के बातें करती चलती। और हम सब पूरे रास्ते मस्ती करते चलते, कितना मज़ा आता था!
दूर से मंदिर का केसरिया झंडा दिखाई देते ही दादी हमें बोलती, "जाओ फटाफट जाकर लाइन में लग जाओ, नहीं तो हनुमानजी के ठीक से दर्शन नहीं हो पाएँगे, बहुत भीड़ हो जाएगी।"
दादी का ये कहना और हमारी टोली जा कर लाइन में लग जाती। धीरे-धीरे खिसकते हुए हम आगे बढ़ते, पर भगवान के दर्शन से ज़्यादा हम प्रसाद में मिलने वाले बूंदी के लड्डू का इंतज़ार होता। शायद बचपन से ही हमारी लाइफ़ के फ़ण्डे कुछ ज़्यादा क्लीयर थे! भगवान के आगे हाथ जोड़, पंडितजी से टीका लगवा और प्रसाद में लड्डू पाकर हम अपने आप को किसी से कम नहीं समझते। 
शायद इसी तरह दादी ने हमारा भगवान के साथ कनेक्शन बना दिया- लड्डू तो सिर्फ़ एक बहाना था! 

Thursday, November 2, 2017

बम्बई वाले मामाजी

इस घटना को तो मैं कभी भूल ही नहीं सकता- अजी, जान बूझ कर नहीं करी थी पर पिटाई तो सॉलिड पड़ी थी! हुआ यूँ की मेरी माँ के बम्बई (उस समय मुंबई को इसी नाम से जानते थे!) वाले मामाजी आए हुए थे। खाने-पीने के बेहद शौक़ीन- जहाँ मौक़ा मिला वही खाने बैठ जाते थे।सिर के बालों ने उनका साथ क़रीब-क़रीब छोड़ दिया था पर अपने बचे-कुचे बालों को साँवरने में वो बहुत समय लगाते थे।एक बार जो शीशे के सामने खड़े होते तो उन्हें वहाँ से कोई नहीं हटा सकता था।अच्छी तरह से ख़ुद को जब तक निहार ना लेते तो नहीं उनको चैन ही नहीं पड़ता था।

सज धज कर निकलते रिश्तेदारों से मिलने के लिए और मुफ़्त का खाना खाने के लिए! मामाजी बहुत कंजूस थे, उनके हाथ से पाँच रुपए भी ना छूटते।बस पहुँच जाते किसी के भी घर और अपनी रसभरी बातों में सबको उलझाए रखते। फिर उनके घर से बिना अपनी सेवा करवाए तो निकलते ही नहीं- ख़ूब दबा कर पकवान उड़ाते और कहते रहते,"रहने दे बेटा, अब बुढ़ापे में इतना तला हुआ खाना नहीं पचता।पर अब तू इतने प्यार से खिला रही है तो मैं तेरा दिल भी तो नहीं तोड़ सकता।" यह कहते-कहते ही ५-७ पूरी, कचौरी, बेडमी, हलवा, बादाम का दूध सब डकार जाते! हम सब लोग हैरान होते की इतने पतले दुबले मामाजी की कितनी ज़्यादा कपैसिटी है। लेकिन मामाजी का खाने-पीने का प्रोग्राम यहीं समाप्त नहीं होता वो आन गोइंग रहता!

जैसे मामाजी सुशीला मौसी के घर से निकलते, तो विनोद चाचा के घर का रास्ता पकड़ लेते।"अब दिल्ली आया हूँ तो विनोद से भी मिल लूँ, बहुत दिन हो गए उसे देखे हुए ।" उनके घर पहुँचते ही,"जा बेटा एक ग्लास पानी ले आ और फिर मेरे लिए शिकंजी बना देना- लगता है सुशीला के घर कुछ ज़्यादा ही खा लिया।" शिकंजी का ग्लास मेज़ पर रखा नहीं और मामाजी शुरू हो जाते, "बेटा ख़ाली शिकंजी नुक़सान करेगी, जा कुछ खाने को भी ले आ।" फिर जैसे ही मेज़ पर खाने का सामान आता सूपर फ़ास्ट ट्रेन की तरह खाना शुरू कर देते। हम लोग हैरानी से एक दूसरे का मूँह ताक रहे होते और यह सोचते की इनका पेट है या कुआँ! पर मामाजी को तो किसी बात का कोई फ़र्क़ ही नहीं पड़ता-उनके दिमाग़ में तो आगे की प्लानिंग चल रही होती।

घर से निकलते ही मामाजी माँ को बोलते," देख आज रात को तू ज़्यादा कुछ मत बनाना मेरे लिए- बस ऐसा करना की मूँग की दाल,मेथी के पराँठे, ज़ीरा आलू, हरे धनिए की तीखी चटनी और खीर बना लेना। मुझे रात के टाइम ज़्यादा भारी खाना पसंद नहीं है।" हम सिर खुजाते हुए सोचते की अगर ये हल्का खाना है तो फिर भारी कौन सा होता है! घर आकर माँ ने जल्दी से खाना तैयार कर दिया और हमें विशेष निर्देश दिया की खीर मेज़ पर ठंडी होने के रखी है और हम बिल्ली को उसके पास ना आने दे। हम खेल में मशगूल थे, कुछ सुना कुछ नहीं। अब खीर कब बिल्ली का नैवैद्य बन गयी हमें मालूम ही ना पड़ा! हमने चुपके से झूठी खीर उठा कर रसोई में ढक कर रख दी।

इतने में मामाजी खाने के लिए आ गए- माँ ने उन्हें खाना परोसा तो वो बोले, "बेटा मैं तो सबसे पहले मीठे से शुरू करूँगा, ला मुझे खीर दे दे ।" जैसे ही उन्होंने ठंडी खीर की चम्मच मूँह में डाली, वैसे ही उनके मूँह में आया बिल्ली की मूँछों का बाल! अब ना तो खीर खाते बनी नहीं ही थूकते, बस ग़ुस्से से हमें घूरते हुए कमरे से बाहर निकल गए।और हम ये सोचते रह गए की अगर बिल्ली खीर पहले टेस्ट कर गयी तो इसमें हमारा क्या क़सूर!

लेकिन माँ ने तो कुछ भी सुनने से इंकार कर दिया और ऐसी पिटाई लगाई जो हमें आज तक याद है!

Sunday, October 29, 2017

छुट्टियों का मतलब

वो गरमियों के लम्बे-लम्बे दिन वैसे तो बहुत भारी लगते थे पर जब हम सब साथ होते तो उतने ही मज़ेदार भी हो जाते थे।कितनी बेसब्री से हम पंद्रह मई का इंतज़ार करते थे- क्योंकि वो हमारी गरमियों की छुट्टियों का सबसे पहला दिन होता था।हमारी प्लानिंग होती की ख़ूब देर तक सोएँगे और आराम से दोपहर तक उठेंगे, पर यही हमारी सबसे बड़ी भूल भी होती।सुबह-सुबह दादी की आवाज़ कानों की शांति भंग कर देती,"कंबख़्तों दिन भर सोते रहोगे क्या ? छुट्टियों का मतलब यह नहीं की सारे दिन बिस्तर तोड़ते रहो, जाओ जल्दी से नहाने जाओ वरना पानी चला जाएगा !"

अब दादी को कौन समझाए की छुट्टियों का मतलब है देर से उठना, आराम से नहाना, अपनी मनपसंद चीज़ें खाना, खेलना और ख़ूब मौज -मस्ती करना।एक तरफ़ दादी और दूसरी तरफ़ बन्नो बुआ! हमें घर पर देखते ही उनके सभी कामों की एक लम्बी फ़ेहरिस्त तैयार हो जाती।"तू कम्मो के घर जाकर नई फ़िल्मी दुनिया ले आ और आते आते शगुन के यहाँ से उसका लाल दुपट्टा ले आना, भूलना मत।" अब बुआ से कौन मगजमारी करे, इससे पहले के वो कोई और काम बताए हम चुपचाप वहाँ से निकल लेते।


तैयार हो कर हम गली में निकलते तो वहाँ कोई नहीं दिखता- होता भी कैसे! एक सिर्फ़ हम ही है जिनके घर में उन्हें सुबह देर तक सोने नहीं दिया जाता है, बाक़ी तो बारह बजे से पहले सो कर उठते भी नहीं। ख़ुद पर कितना तरस आता था पर क्या करे- रहना भी तो इसी घर में था। थोड़ी देर धूप में धक्के खा कर आते तो वहाँ से माँ की आवाज़ आती, "छुट्टियाँ शुरू हो गयी और शुरू हो गयी इनकी आवारागर्दी।बस दिन चढ़ते ही गली में घूमना चालू कर दिया।इतना भी नहीं होता की माँ की कोई मदद कर दें ।"

हे भगवान यह गरमियों की छुट्टियाँ तो हमारे जी का जंजाल हो गयीं हैं जिसे देखो वो ही पेनल्टी कॉर्नर से फ़्री किक मार रहा है।

ग़लती से यदि हम रसोई में दाख़िल हो गए फिर तो जैसे माँ के रडार पर आ गए। एक बार दुश्मन जहाज़ भी बच कर निकल सकता है पर माँ की तेज़ निगाहों से बचना, नामुमकिन।"अब समझ आया की पानी की बोतलें कौन ख़ाली रख कर भाग जाता है।और वो फ़्रीज़र में से किसने बर्फ़ निकाली थी? ट्रे में पानी तो मेरी माँ भर कर रखेगी ना। तुम तो सारे दिन बस ऊधमबाज़ी किया करो।" पानी पीना भी एक दंडनीय अपराध हो जाता था।लेकिन हम कौन से कुछ कम थे, जब मौक़ा मिलता पानी के बजाय चुपके से रसना या ऑरेंज स्क्वॉश पी कर भाग जाते- पर हम सारी कारस्तानी पकड़ी जाती। जब जगह-जगह टपके हुए स्क्वॉश पर चींटियों की लाइन मार्च पास्ट कर रही होती तो उसके बाद होता हमारा कोर्ट मार्शल!

दिन की दिक़्क़तों को झेलते हुए शाम तक पहुँचते तो पिताजी से सामना जाता।"सारे दिन ख़ूब मस्ती करी होगी, अब जाओ थोड़ी पढ़ाई कर लो। छुट्टियों का मतलब ये नहीं की किताबों को हाथ ही मत लगाओ, वरना स्कूल खुलते ही इम्तिहान में फ़ेल हो जाओगे।"

हम तो पूरी गर्मियाँ यह समझते रह जाते की सही मायने में छुट्टियाँ कहते किसी हैं!

बन्नो बुआ

हमारी बन्नो बुआ थी कुछ हट के! बिलकुल स्टाइलिश. हर चीज़ में एकदम अप -टू-डेट, फिर चाहे वो लेटेस्ट गॉसिप हो, फ़िल्मी ज्ञान, फ़ैशन या फिर बा...