Wednesday, May 6, 2020

बच्चे तो बच्चे बाप रे बाप

बन्नों बुआ ने तो ये डिसाइड कर रखा था की कुछ भी हो जाये वो हमें पिताजी से दिन में एक बार ज़रूर डाँट पिटवाएँगी, चाहे हम कुछ शैतानी करें या ना करें. हम बरामदे में चुपचाप(यक़ीन नहीं होता ना आपको पर कभी- कभी ऐसा भी होता था, माँ क़सम!) खेल रहे होते तो अपने कमरे से आवाज़ लगाती, “ मन्नू, ज़रा पुष्पा के घर जा और गृहशोभा ले आ और हाँ,आते-आते सिम्मी के घर से पुरानी सरिता भी ले आना. फटाफट जा.” ये तो हद हो गयी, बुआ को दोपहर को भी चैन नहीं है. मैंने पटाक से जवाब दिया, “ मैं नहीं जाता अभी मैं खेल रहा हूँ, शाम को जाऊँगा.” मेरा इतना कहना ही था बुआ ने तुरुप का पत्ता फेंका, "आने दे भाई को तेरी सारी बातें बता दूँगी उनको- फिर पता चलेगा." अब क्या करता, मजबूरी का दूसरा नाम शायद मैं ही था! चप्पल पहनी और निकल गए बुआ का काम करने- जी में तो आ रहा था की ना करे पर कोई चॉस नहीं थी हमारे पास. पुष्पा और सिम्मी के घर से मैगज़ीन लेकर जैसे ही निकले हमारे खुरपाती दिमाग़ की बत्ती जल गई! पीपल के पेड़ के नीचे बैठ कर प्लान बनाया और धीरे- धीरे घर की तरफ़ चल दिए. चुपके से बुआ के कमरे में झांका तो देखा बुआ सो रही है, फिर क्या था हमारा प्रोग्राम शुरू! अब चार- पाँच मैगज़ीन से अगर दो की आहुति दे दी जाए तो क्या फ़र्क़ पड़ेगा. हमने उठाई कैंची और सुंदर - सुंदर तस्वीरें काटनी शुरू कर दी. अब कितने दिनों से हम अपनी क्राफ़्ट बुक के लिए ये सब ढूँढ रहे थे पर समझ नहीं आ रहा थी की कहाँ से लायें. कभी तीसरा पन्ना,तो कभी दसवाँ - जहां पर अच्छा लगा वहाँ पे कैंची चल दी! गृहशोभा और सरिता के पन्नों की हमने धज्जियाँ ही उड़ा दी थी- पन्नों की ऐसी खूबसूरत जालियाँ बनी की एक बार तो हम भी अपनी कलाकारी देख के चौंक गए! हम जानते थे की हमारी इस मेहनत को कोई हमें इनाम नहीं देगा पर हमने ही अपनी पीठ खुद थपथपा ली. अब कटिंग के बाद ओवर्वेट मैगज़ीन स्लिम हो गयी थीं! दबे पाँव जा कर इन दो को बाक़ी सब के बीच में रख दिया और आकर वापिस अपने खेल कूद में लग गए. शाम को होम्वर्क करके खेलने जा ही रहे थे की बुआ और पिताजी की आवाज़ का कोरस सुनाई दिया- हमारे कदम तो मानो जम गए! रिवर्स गेयर में सीधे पहुँचे बैठक में जहां हमारी धुलाई का प्रोग्राम होने वाला था. “ क्या तू ये गृहशोभा सिम्मी के घर से लाया है ? और ये सरिता किसकी है, पुष्पा की? हमारे मुँह में तो जैसे दही जम गया था, बस हमारी लस्सी बनने की देर थी. धीरे से बोला, तो पिताजी गुराए, “ खाना नहीं खाया आज ?” तभी बुआ ने पन्नों की जाली से झांकते हुए पूछा,“ ये वाली भी?”  इससे पहले की हम कुछ बोल पाते, बुआ और पिताजी ज़ोर -ज़ोर से हंसने लगे और एक दूसरे को देखते हुए बोले, “ ये तो हमसे भी बढ़िया कलाकार निकले !”
हम एक दूसरे की शक्ल देखने लगे तभी पीछे से दादी आकर बोली, “ तेरे पिताजी भी कोई कम बदमाश नहीं थे, शैतानियों में तो वो तुम्हारे भी बाप थे, समझे क्या! चलो भागो यहाँ से और आगे से बिना पूछे कोई किताब से कुछ मत काटना. बन्नो तू सिम्मी और पुष्पा से बात कर लेना.”
दादी की बात की बात के साथ -साथ पहली ये मुहावरा भी समझ में आया कि बच्चे तो बच्चे, बाप रे बाप!
अजी, हम तो सिर्फ़ अपने बड़ों के नक़्शे कदमों पर ही चल रहे थे. क्या समझे!

Wednesday, March 11, 2020

स्याही की चाल

कोई भी नई टाइप की बदमाशी हो और हम सब उसमें शामिल ना हो ऐसा तो इम्पॉसिबल था! यह तो शायद हमारी जन्मकुंडली में भी नहीं लिखा था।अज़ी, हम थे ही कुछ अलग टाइप के, सब से हट के। घर हो या स्कूल हमारी बदमाशियाँ हम से दो क़दम आगे चलती थी और फिर फटकार मिले या मार हमें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था। चलिए, एक मज़ेदार क़िस्सा सुनता हूँ - हुआ यूँ की हम सब क्लास में पहुँचे तो पता चला की क्लास टीचर नहीं आएँगी और मिस शर्मा रेप्लेस्मेंट टीचर होंगी।इतना सुनना था की सब बच्चे शोर मचाने लगे- अब पाँच ख़ाली पिरीयड जाते देख किसे दुःख नहीं पहुँचता।हमने तो कितने सुंदर -सुंदर सपने सज़ा लिए थे अपना समय काटने के लिए।रज्जू का रूबिक क्यूब, पिंटू की अमर चित्र कथा, बबलू का वॉकमैन, शोंटू के फ़ैंटम, फ़्लश गॉर्डन के कॉमिक्स और कितनी चीज़ें हम सब ट्राई करना चाहते थे।और सच जानिए उसके लिए आज का दिन बिलकुल पर्फ़ेक्ट था! शायद हम मासूमों की ख़ुशी से किसी को इतनी ज़्यादा जलन हो गयी की मिस शर्मा को भेज दिया।"अबे, हम कॉमिक्स कैसे पढ़ेंगे और रूबिक क्यूब, उसका क्या बे!" पीछे से मोंटू फुसफुसाया। दिल में आया की उसको एक उलटे हाथ का दूँ, पर मिस शर्मा की पैनी निगाहों से बचना नामुमकिन ही नहीं बेहद मुश्किल भी था।
"खड़े हो जाओ कुर्सी पर, माँ - बाप के पैसे बर्बाद करवाते शर्म नहीं आती।क्या यही सब करने आते हो स्कूल में?" पीछे पलट कर देखा तो बेचारा बिल्लू फिल्मफेअर पढ़ते हुए पकड़ा गया था और उसकी कहानी किसी फ़िल्म से कम नहीं लग रही थी! वो गर्दन झुकाए नान-स्टॉप डाँट की बारिश में भीगा जा रहा था और उसको बचाने वाले प्रभु जी शायद अपनी लंच ब्रेक पर गए थे। क्लास में तनाव बढ़ता जा रहा था और हमारी बोरियत भी! पाँच पिरीयड हम कैसे काटेंगे ये हमारी समझ के बाहर था और फिर पानी में रह कर मगर से भी तो नहीं बैर कर सकते थे। कैसे छुटकारा पायें इस मुसीबत से सबके दिमाग़ में यही एक सवाल था। चलो, फ़ोर ऐ चेंज हम सब यूनाइटेड थे इस मामले में! तभी दीपू के पेन को देख एक मस्त ख़याल आ आया - जो मिस शर्मा की गाड़ी को हमारी कक्षा के स्टेशन से रवाना करवाएगा और हमारा उद्धार भी करेगा। मैंने बबलू और बिट्टू को अपना प्लान बताया और चल पड़ा सिर पर कफ़न बाँध मिस शर्मा की मेज़ की तरफ़- दिल तो ऐसे धड़क रहा था मानो आज ही पूरे जीवन की कसर पूरी कर लेगा! मिस शर्मा ब्लैक बोर्ड पर कुछ लिख रही थी और मैं उनके पीछे। मैंने पेन झटक कर जैसे ही स्याही उनकी साड़ी पर डाली तो मेरे साथ एक भयानक धोखा हो गया। स्याही ने चाल बदल डाली - अब वो साड़ी की बजाए मिस शर्मा के मुँह की रौनक़ बढ़ा रही थी और मेरा चेहरा फीका पड़ गया था। क्लास में एकदम सन्नाटा छा गया- क्या होगा कोई नहीं जानता था। मैं और मेरी तन्हाई अपने आने वाले काले कल के बारे में कुछ विचार-विमर्श कर ही रहे थे कि अचानक से एक झनाटेदार झापड ने मुझे मेरी तन्हाई से जुदा कर दिया। फिर क्या, मुझे एक की बजाए कई -कई मिस शर्मा दिखायी देने लगीं! 
उसके बाद जो मेरे साथ हुआ, उसका विवरण ना देना ही बेहतर होगा। ये जान लीजिए की स्याही की टेढ़ी चाल ने मेरी चाल सीधी कर दी !

Wednesday, March 4, 2020

रंग-बिरंगी कहानी

अब बन्नो बुआ का नैशनल पास टाइम था हम बच्चों को डाँटना और वो कोई भी मौक़ा नहीं छोड़ती थी हमें डाँट की घुट्टी पिलाने का, चाहे हमें ज़रूरत हो या ना हो! “ कितनी बार बोला है मेरे कमरे में रखी चीज़ों को मत छेड़ा करो, पर बहुत ढीठ हो तुम सब, कहना ही नहीं मानते.” बाई दी वे, बन्नो बुआ के कमरे में सबसे इक्साइटिंग चीज़ें रखीं होती थी और सब हमें अपनी तरफ़ आकर्षित करती है रहतीं! वो सिंगार मेज़ पर रखीं तरह -तरह की रंगीन काँच की बोत्तलें, कुछ छोटी, कुछ बड़ी और वो गोल डिब्बियाँ जिन पर सुंदर -सुंदर फूलों की,पहाड़ों की फ़ोटो चिपकी होती- ना जाने इनके क्या जादू भरा हुआ था की इनमें से कुछ लगाते ही हमारी बुआ एक दम ईस्ट्मन कलर वाली फ़िल्मों की हीरोइन की तरह लगने लगती। सिंगार मेज़ के शीशे की दोनों तरफ़ लटकती,झूलती हुई रंग- बिरंगे रेशमी धागों वाली काली-काली चोटियाँ जो बुआ की ज़ुल्फ़ों को अपना टोटल सपोर्ट दे कर उन्हें और लम्बा बना देतीं थी।बुआ अपने सलवार क़मीज़ से मैच करती हुई रेशमी धागों वाली चोटी लगा कर जब घर से बाहर निकलती तो सच जानिए बेहद सुंदर दिखती थी, बिलकुल मीना कुमारी, मधुबाला टाइप्स! हमारे मुँह से बुआ की तारीफ़ सुन कर आप आश्चर्य चकित रह गए ना, हम भी। 
मैं आपको एक बहुत मज़ेदार वाक़या सुनाता हूँ, हुआ यूँ की गरमियों की छुट्टियाँ चल रही थी और दोपहर में हमें बाहर खेलने की बिलकुल इजाज़त नहीं थी। जैसे ही बाहर निकलते वैसे ही दादी के प्रवचन शुरू हो जाते , "कंबख़्तों, लू लग जाएगी, चलो अंदर चल कर खेलो!। नासपीटे सुनते ही नहीं! सारे -सारे दिन ऊधम मचाते रहते हैं!" बाहर खेले तो मुश्किल, अंदर खेले तो उससे भी ज़्यादा मुश्किल। हमारे लिए तो इधर कुआँ और उधर खाई! अब अंदर तो आ गए पर करे क्या कुछ समझ नहीं आ रहा था। लूडू, ताश, साँप-सीढ़ी, कैरम खेल-खेल कर हम बहुत बोर हो गए थे और कोई  नया खेल भी सूझ नहीं रहा था। कभी इस कमरे में तो कभी उस कमरे और फिर वो हुआ जो नहीं होना चाहिए था- हमने सीधा लैंड करा बन्नो बुआ के कमरे में! बुआ और माँ किसी काम से बाहर गयी हुई थी और हमारे लिए यह बदमाशी करने का  गोल्डन अवसर था। इस समय हम किसी दंगाई लंगूरों की टोली से कम नहीं थे- सिंगार मेज़ पर रखी सभी रंग- बिरंगी बोतलों का रसायनिक निरीक्षण- परीक्षण शुरू कर दिया, 'अब हर घर कुछ कहता है', इसी बात को समझते हुए बुआ की कमरे की फीकी दीवारों को ऐशीयन पैंट्स की बजाए लिप्स्टिक के रंगों से निखार दिया। शायद, बुआ का कमरा हमें थैंक यू कहेगा और बुआ भी! हमने खेलने के लिए बुआ की रंगीली चोटियाँ ली और चार- पाँच को जोड़ रस्सी बना कर जैसे ही पहला खिलाड़ी रेडी हुआ, तैसे ही बुआ प्रकट हो गयी - साक्षात महिशासुर मर्दिनी की तरह! बस उसके बाद जो दानव संहार हुआ - हम बच्चे आज तक नहीं भूल पाए हैं!

Saturday, September 14, 2019

बॉटल में बदमाशी

हमारी बदमाशियों से दादी परेशान रहती थी और उनकी हिदायतों से हम, ऐसा जान पड़ता था की हम दोनो में कोई ताल -मेल ही नहीं है। हमें आए दिन कोई ना कोई नयी शरारत सूझती ही रहती थी जिससे दादी का ब्लड प्रेशर आउट ऑफ़ कंट्रोल हो जाता था। " कमबख़्त, सारे दिन ऊधम करते रहते है, ज़रा देर सुकून नहीं लेने देते। कभी इधर छेड़खानी तो कभी उधर, निचला बैठना तो आता ही नहीं है।" हमने सब की नाक में दम कर रखा था, अब क्या करे जनाब बदमाशी तो हमारी रग- रग में भरी हुई थी, इतनी आसानी से कैसे छोड़ देते।कुछ घर आए मेहमानों से तो हमारा छत्तीस का आँकड़ा था- ना वो हमें भाते थे और ना हम उन्हें। फिर क्या, जब वो अनचाहे मेहमान घर आते तो हमारा दिमाग़ नयी-नयी शैतानियाँ सोचने पर मजबूर हो जाता। अब कुछ ऐसा तब हुआ जब माँ के बम्बई वाले मामाजी हमारे घर पधारे! उनके साथ हमें एक नहीं बहुत सारी प्राब्लम्ज़ थी।एक तो वह बहुत बड़े पेटू थे और फिर ओवर ईटिंग करके गंदी बदबूदार हवा से सारे घर का माहौल ख़राब कर देते थे और नाम लगाते हमारा! "सुनीता, तेरे बच्चे सारे दिन कुछ भी अनाप -शानप खाते रहते हैं जिसे इनका पेट ख़राब हो जाता है, ज़रा ख़याल रखा कर इनके खाने का!" इक्स्क्यूज़ मी!नानाजी पेट हमारा नहीं आपका ख़राब रहता है, आप दिन भर मुँह जो चलाते रहते हैं, पर यह बात सिर्फ़ दिल में ही रहती बाहर ना आ पाती। हमारा हाज़मा बहुत अच्छा था! माँ के मामाजी ना सिर्फ़ ज़्यादा खाते थे, उससे कहीं ज़्यादा बातें भी करते थे और लम्बी- लम्बी छोड़ते भी थे और हम बैठ कर उनकी गप लपेटा करते थे।सब के घर जा कर खाना, बातें करना, गप्पें हाँकना और रिश्ते करवाना उनका फ़ेवरेट पास टाइम था। 
अब एक दिन हुआ यूँ की नानाजी को बहुत जल्दी मची हुई थी, सुबह से सबको परेशान कर रखा था। बेचारा धोबी मुफ़्त में डाँट खा कर घर से कुछ देर पहले ही निकला था और उसके जाते ही बहुत सबों के डाँट खाने के नम्बर लगे हुए थे। हम तो सामने ही नहीं पड़े, वरना लेने के देने पड़ जाते।"अच्छा सुनिता, अब मैं सन्नों के घर जा रहा हूँ, वही दोपहर का खाना भी खाऊँगा और शाम को वापिस लौटूँगा।"यह कह नानाजी ने फटाफट से मेज़ पर रखी बोतल उठाई और मुँह को लगा ली और उसके बाद जो तमाशा हुआ बस पूछिए ही मत! तुरंत ही थू-थू करने लगे और सबको कोसना शुरू कर दिया।" किस कमबख़्त ने ये मरा मिट्टी का तेल* पानी की बोतल में रखा है, अब दूर से पता ही नहीं चला की पानी है या कुछ और अब तो ही उलटी करनी पड़ेगी!" 
यह कह कर वे सीधे वाश बेसिन की तरफ़ भागे और हम सब कमरे के बाहर भागे इससे पहले हम पर कोई इल्ज़ाम लगाता और हम अपनी वकालत भी ना कर पाते।पर जनाब क्या करे, हमारी बदमाशियों का ट्रैक रेकर्ड कुछ ज़्यादा ही ख़राब था। माँ ने टेढ़ी आँखों से हमें देखा पर इस बार तो यह बाज़ी शायद किसी और ने मार ली थी। इस घर में हमारे अलावा भी कोई और है जो नानाजी को कुछ कम पसंद करता है पर कौन यह तो आज तक भी नहीं पता चला !
*( उस ज़माने में मिट्टी का तेल बिलकुल पानी के रंग जैसा होता था, आजकल जैसे नीले रंग का नहीं ) 

Tuesday, February 5, 2019

होली के रंग

जैसे ही त्योहारों का मौसम आता हम सब बहुत ही उत्साहित हो जाते, अब कोई रोज़ रोज़ त्योहार थोड़े ही आते हैं! वैसे तो हमें सब त्योहार पसंद थे पर होली हमारा फ़ेवरेट था। सबसे मज़े की बात उस दिन दादी, माँ या बन्नो बुआ हमें कुछ भी नहीं कहती और हमें शैतानी करने का लाइसेन्स मिल जाता। दो -तीन दिन पहले से घर में बढ़िया पकवान बनने शुरू हो जाते- जैसे ख़स्ता मठरियाँ, नमकपारे, बेसन के लड्डू, नमकीन सेव और नारियल -मेवा भरी गुँझिया। पूरा घर इन स्वादिष्ट पकवानों की ख़ुशबू से महक उठता। हम अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश लगा कर रसोई से कुछ ना कुछ चुराने की फ़िराक़ में लगी रहते और मिशन फैल होने पर दादी के प्रवचन भी सुनते।" कंबख़्तो, कितनी बार मना किया है, मठरी-लड्डू छोटी होली वाले दिन पूजा के बाद मिलेंगे, पर तुम नासपीटे सुनते नहीं हो!" दादी हड़का कर हमें रसोई से बाहर कर देती थी। यह तो हुई खाने की बातें, अब सुनिए हमारी होली की तैयारी के बारे में। माँ के साथ जा कर हम गुब्बरों के बड़े- बड़े पैकेट ले कर आते, साथ में गोली वाले पक्के रंग और गुलाल भी।दो- तीन दिन पहले से बड़े -बड़े प्लान बनने शुरू हो जाते- कितने ग़ुब्बारे तैयार करने हैं, रंग वाला पानी कौनसी बालटी में रखना है, पक्के रंग किस- किस को लगाने हैं और ना जाने क्या-क्या! होली से पहले ही हमारी बदमाशियाँ शुरू हो जातीं- गली में आते जाते लोगों पर ग़ुब्बारे फेंकना, चुपके से रंग लगाना और मस्ती करना। हम तो घर की दीवारों को भी नहीं छोड़ते थे! अलग-अलग रंग हाथों पर लगा दीवारों पर छापे बनाते तो हर दीवार यही कहती,"अरे बच्चों अभी तीन महीने पहले ही तो दादी ने सफ़ेदी करवायी थी, क्यों हमारा सत्यनास कर रहे हो?" पर जनाब हमने तो कभी किसी की सुनी कहाँ! होली से चार-पाँच दिन पहले की बात है, बंटू चाचा ख़ूब सज-धज के पिताजी से मिलने हमारे घर आए। बातों बातों में उन्होंने पिताजी को बताया की वो मेरठ जा रहे है। उस दिन चाचा ने बढ़िया सिल्क का कुर्ता और पजामा पहना हुआ था और एकदम हीरो लग रहे थे! वो बैठक में पिताजी से बातें कर रहे थे , उधर माँ उनके खाने-पीने का समान परोस रही थी। हम बच्चों ने जैसे ही चाचा को बरामदे की खिड़की से झाँका, हमारे खुरपाती दिमाग़ में एक धमाकेदार विचार आया। अब होली पर चाचा नहीं होंगे, क्यों ना आज ही उनके साथ रंग-मिलन कर ले! बस सब के सब सोचने लगे की किस तरह चाचा को बाहर निकलते ही हम घेरें।अब पिताजी के रहते ये काम मुश्किल तो था पर नामुमकिन नहीं। हमने तय किया कैसे ना कैसे बंटू चाचा को तो रंगना ही है, बाद में देखेंगे क्या करना है। जैसे ही खा- पी कर चाचा कमरे से बाहर निकले हम सारे बच्चे उन्हें मिलने पहुँच गए। हम सब ने गीले हाथों पर पक्का गुलाबी,हरा,नीला और जामुनी रंग लगा रखा था।जैसे ही चाचा ने दरवाज़े की तरफ़ रूख किया वैसे ही हम सब ने उनकी पीठ को कैन्वस बना कर उस पर रंग-बिरंगे छापे बना दिए। चाचा का झक सफ़ेद कुर्ता देखते ही देखते एम एफ हूसैन की पेंटिंग में तब्दील हो गया! और फिर उसके आगे का हाल हम बयान ना कर पाएँगे, बेहतर हो गया की आप रीडर्ज़ ही ख़ुद समझ ले की कहानी किस तरफ़ मुड़ी होगी!

Sunday, November 11, 2018

बन्नो बुआ

हमारी बन्नो बुआ थी कुछ हट के! बिलकुल स्टाइलिश. हर चीज़ में एकदम अप -टू-डेट, फिर चाहे वो लेटेस्ट गॉसिप हो, फ़िल्मी ज्ञान, फ़ैशन या फिर बातें. बुआ जैसी पूरे मोहल्ले में कोई और नहीं थी, वो थी ही इतनी निराली! इधर- उधर गप्पें हाँक कर समय बर्बाद करना उनकी विशेष हॉबी थी, जिसकी वजह से वो अक्सर दादी से ख़ूब डाँट खाती.” कम्बख़्त सारे समय सहेलियों के साथ बातें करती रहती है, घर के काम क्या ख़ाक सीखेगी. आने दो घर आज उसकी टाँगे तोड़ूँगी!” हमें बहुत मज़ा आता जब बुआ को डाँट पड़ती थी. वो मज़ा हमें महंगा बहुत पड़ता और ख़ामियाज़ा भी भुगतना पड़ता! डाँट खाने के बाद बुआ दनदनाती हुई कमरे में आती और आते ही आवाज़ लगाती,“ पिंटू मेरे लिए एक ग्लास ठंडा पानी तो ला और फिर आ कर मेरा सिर दबाना. कुछ काम नहीं करता तू आजकल, निकम्मा कहीं का!
 हैं, ये क्या? दादी का ग़ुस्सा मेरे ऊपर!
बन्नो बुआ के मिज़ाज ही निराले थे- उनके कमरे में सिंगार मेज़ के ऊपर तरह - तरह का समान रखा रहता था. पांड्ज़ टैल्कम पाउडर, अफ़ग़ान स्नो, पर्फ़्यूम, चूड़ियों का डिब्बा, रंग- बिरंगी काँच के बोतलें, मेकअप का समान और ना जाने क्या -क्या.हमें टेबल के पास जाना बिलकुल भी अलाउड नहीं था. उसके आस-पास तो हम पर भी नहीं मार सकते थे. 
वो बुआ की फ़ेवरेट जगह थी और हमारे लिए नो एंट्री ज़ोन! कभी- कभी जान जोखिम में डाल, अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए और इतने सारी इंट्रेस्टिंग वस्तुओं को देखने के लिए ग़लती से कभी उधर कूच भी कर जाते तो बुआ की ऐसी फटकार पड़ती की क्या बताऊँ. बुआ के कमरे के बुक शेल्फ़ में किताबें कम और फ़िल्मी मैगज़ीन ज़्यादा दिखती थी, जो वो अपनी सहेलियों के साथ अक्सर इक्स्चेंज भी करती. दादी की नज़रे बचा बुआ कभी- कभी अंग्रेज़ी के रोमांटिक नॉवल यानी “ मिल्ज़ एंड बून” भी पढ़ती थी.उनको वो ब्राउन काग़ज़ चढ़ा के रखती थी ताकि सबको लगे की वो अपने कोर्स की किताबें पढ़ रही हैं.
पर कहते है ना झूठ के पैर नहीं होते! एक दिन जब बुआ अपनी सहेलियों के साथ बाहर गयी हुई थी दादी ने डिसाइड किया कि बुआ के कमरे की स्प्रिंग क्लीनिंग होनी चाहिये. फिर क्या था एक- एक चीज़ निकाल कर सफ़ाई हुई। धूल-धूसरित किताबें को तो जैसे ऑक्सिजन मिल गया हो, चप्पल, सैंडल और जूतियाँ को भी ताज़ी हवा नसीब हो गयी. कमरे की सारी चीज़ें दादी को थैंक यू बोल रही थी मानो! तभी दादी की तेज़ नज़र पड़ी ब्राउन पेपर चढ़ी किताबों पर. तुरंत बोली,” ऐ कमला पकड़ा तो किताबें, ज़रा देखूँ कॉलेज में क्या पढ़ रहें हैं आजकल .”
पहली किताब आते ही दादी के चेहरे का रंग ही बदल गया, फिर दूसरी ने इक्स्प्रेशन बदल दिया और देखते ही देखते दादी ग़ुस्से से आग- बबूला हो गयी.” आने दो घर बन्नो को, आज ऐसी धुलाई करूँगी याद रखेगी.यही सब पढ़ाते है कॉलेज में। कल से कोई ज़रूरत नहीं है कॉलेज जाने की !”
शाम को जब बन्नो बुआ घर पर आयी तो डाँट के बदल ऐसे गरजे और बरसे की उसके बाद बुआ ने किताबों पर कवर चढ़ना ही छोड़ दिया और बुआ की 'मिल्ज़ एंड बून' वन्स इन आ ब्लू मून हो गयी!

Wednesday, November 7, 2018

कवर स्टोरी

स्कूल और घर में कोई ना कोई हंगामा लगा ही रहता था- बिलकुल ऐक्शन फ़िल्मों की तरह. मज़ा तो उस दिन आया जिस दिन बंटू उसको ले कर आया.आप सोच नहीं सकते कितना हंगामा मच गया था पूरी क्लास में! सब बच्चे उस की एक झलक देखना चाहते थे. सब लोगों में खुसर- पुसर हो रही थी, लड़कियों में गुपचुप बातें हो रही थी और माहौल कुछ अलग ही लग रहा था. तभी कोई आवाज़ आयी, “आज आने दो शर्मा मैडम को इस बंटू की शिकायत करेंगे, ऐसी चीज़ें कोई स्कूल में लाता है ?” पीछे पलट कर देखा तो बबली अपनी सहलियों से कह रही थी. अरे भाई ऐसा क्या भूकम्प आ गया इस मरियल क्लास में, जो सब उछल रहे थे!
मेरी और जग्गू की समझ से बिलकुल परे था ये हंगामा. भई, हम तो बंटू की लीग में आते ही नहीं थे- कहाँ वो और कहाँ हम! वो तो हमेशा नई- नई चीज़ें लाता था जो उसके लिए उसकी लंदन वाली मौसी और कनाडा वाले मामा भेजा करते थे. जानते हैं, वो भी फ़ोरेन कंट्री घूम कर आया था पिछले साल! उसके पिताजी उसे नेपाल ले गए थे और एक हमारे है, जिनसे हमारी बात करने की हिम्मत ही नहीं होती.हमारे सरसों के तेल से चमकाए बालों की महक की वजह से लड़कियाँ क्या लड़के भी एक हाथ का फ़ासला बनाए रखते हैं हमसे. कितनी बार माँ को समझाया पर हमारी बात की तो कोई अहमियत ही नहीं है. चलिए जाने दीजिए, लौटते हैं बंटू के कांड पर...
हमने बहुत बारी उसके डेस्क तक जाने की कोशिश की पर हमारे हाथ सिर्फ़ नाकामी ही लगी. क्लास में बंटू अपने चेलों के साथ घिरा बैठा रहा और हम ये सोचते रहे के कैसे जा कर देखे की वो क्या लाया है. उसके ग्रूप के बच्चे ख़ूब मज़े से उसके साथ बैठ कर देख रहे थे. हम जैसे- तैसे हिम्मत करके उसके डेस्क पर पहुँच गए और हमारी नज़र जैसे ही उस पर पड़ी तो हम भौंचके रह गए. “ अबे यह क्या ले आया? तेरी तो आज ख़ूब धुलाई होगी!”, मैंने उसे बोला. उसके पास थी प्लेबॉय मैगज़ीन, जिसमें लड़कियों के अश्लील तस्वीरें होती है! 
सच जानिये हमारे पैरों तले ज़मीन ही खिसक गयी और बंटू की हिम्मत देखिए की वो ऐसी मैगज़ीन स्कूल ले आया. कितना दबंग! हमारे लिए तो वो कुछ टाइम के लिए रोल मॉडल ही बन गया था. 
आज से पहले किसी ने इतनी हिम्मत नहीं करी थी. हमें तो कवर की एक झलक ही मिली. इससे पहले हम आगे बढ़ कुछ और देख पाते ठाकुर सर ने क्लास में एंट्री मार दी. हम रिवर्स गीयर में पीछे हो लिए और चुगलख़ोर लड़कियाँ फ़ुल स्पीड में सर के पास!
फिर आगे की क्या कहूँ, भयानक नज़ारा था! सर डाइव मार कर बंटू के डेस्क पर और इस से पहले वो मैगज़ीन को  छिपा पता, मैगज़ीन सर के हाथ में. फिर क्या था, दे-दना-दन-दे! उसकी ऐसे धुलाई हुई की वो और उसका चेहरा किसी मैगज़ीन के कवर पेज पर क्या अंदर के पेज में भी छपने के लायक ना रहा.

बच्चे तो बच्चे बाप रे बाप

बन्नों बुआ ने तो ये डिसाइड कर रखा था की कुछ भी हो जाये वो हमें पिताजी से दिन में एक बार ज़रूर डाँट पिटवाएँगी, चाहे हम कुछ शैतानी करें या ना...