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बॉटल में बदमाशी

हमारी बदमाशियों से दादी परेशान रहती थी और उनकी हिदायतों से हम, ऐसा जान पड़ता था की हम दोनो में कोई ताल -मेल ही नहीं है। हमें आए दिन कोई ना कोई नयी शरारत सूझती ही रहती थी जिससे दादी का ब्लड प्रेशर आउट ऑफ़ कंट्रोल हो जाता था। " कमबख़्त, सारे दिन ऊधम करते रहते है, ज़रा देर सुकून नहीं लेने देते। कभी इधर छेड़खानी तो कभी उधर, निचला बैठना तो आता ही नहीं है।" हमने सब की नाक में दम कर रखा था, अब क्या करे जनाब बदमाशी तो हमारी रग- रग में भरी हुई थी, इतनी आसानी से कैसे छोड़ देते।कुछ घर आए मेहमानों से तो हमारा छत्तीस का आँकड़ा था- ना वो हमें भाते थे और ना हम उन्हें। फिर क्या, जब वो अनचाहे मेहमान घर आते तो हमारा दिमाग़ नयी-नयी शैतानियाँ सोचने पर मजबूर हो जाता। अब कुछ ऐसा तब हुआ जब माँ के बम्बई वाले मामाजी हमारे घर पधारे! उनके साथ हमें एक नहीं बहुत सारी प्राब्लम्ज़ थी।एक तो वह बहुत बड़े पेटू थे और फिर ओवर ईटिंग करके गंदी बदबूदार हवा से सारे घर का माहौल ख़राब कर देते थे और नाम लगाते हमारा! "सुनीता, तेरे बच्चे सारे दिन कुछ भी अनाप -शानप खाते रहते हैं जिसे इनका पेट ख़राब हो जाता है, ज़रा…

होली के रंग

जैसे ही त्योहारों का मौसम आता हम सब बहुत ही उत्साहित हो जाते, अब कोई रोज़ रोज़ त्योहार थोड़े ही आते हैं! वैसे तो हमें सब त्योहार पसंद थे पर होली हमारा फ़ेवरेट था। सबसे मज़े की बात उस दिन दादी, माँ या बन्नो बुआ हमें कुछ भी नहीं कहती और हमें शैतानी करने का लाइसेन्स मिल जाता। दो -तीन दिन पहले से घर में बढ़िया पकवान बनने शुरू हो जाते- जैसे ख़स्ता मठरियाँ, नमकपारे, बेसन के लड्डू, नमकीन सेव और नारियल -मेवा भरी गुँझिया। पूरा घर इन स्वादिष्ट पकवानों की ख़ुशबू से महक उठता। हम अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश लगा कर रसोई से कुछ ना कुछ चुराने की फ़िराक़ में लगी रहते और मिशन फैल होने पर दादी के प्रवचन भी सुनते।" कंबख़्तो, कितनी बार मना किया है, मठरी-लड्डू छोटी होली वाले दिन पूजा के बाद मिलेंगे, पर तुम नासपीटे सुनते नहीं हो!" दादी हड़का कर हमें रसोई से बाहर कर देती थी। यह तो हुई खाने की बातें, अब सुनिए हमारी होली की तैयारी के बारे में। माँ के साथ जा कर हम गुब्बरों के बड़े- बड़े पैकेट ले कर आते, साथ में गोली वाले पक्के रंग और गुलाल भी।दो- तीन दिन पहले से बड़े -बड़े प्लान बनने शुरू हो जाते- कित…

बन्नो बुआ

हमारी बन्नो बुआ थी कुछ हट के! बिलकुल स्टाइलिश. हर चीज़ में एकदम अप -टू-डेट, फिर चाहे वो लेटेस्ट गॉसिप हो, फ़िल्मी ज्ञान, फ़ैशन या फिर बातें. बुआ जैसी पूरे मोहल्ले में कोई और नहीं थी, वो थी ही इतनी निराली! इधर- उधर गप्पें हाँक कर समय बर्बाद करना उनकी विशेष हॉबी थी, जिसकी वजह से वो अक्सर दादी से ख़ूब डाँट खाती.” कम्बख़्त सारे समय सहेलियों के साथ बातें करती रहती है, घर के काम क्या ख़ाक सीखेगी. आने दो घर आज उसकी टाँगे तोड़ूँगी!” हमें बहुत मज़ा आता जब बुआ को डाँट पड़ती थी. वो मज़ा हमें महंगा बहुत पड़ता और ख़ामियाज़ा भी भुगतना पड़ता! डाँट खाने के बाद बुआ दनदनाती हुई कमरे में आती और आते ही आवाज़ लगाती,“ पिंटू मेरे लिए एक ग्लास ठंडा पानी तो ला और फिर आ कर मेरा सिर दबाना. कुछ काम नहीं करता तू आजकल, निकम्मा कहीं का!  हैं, ये क्या? दादी का ग़ुस्सा मेरे ऊपर! बन्नो बुआ के मिज़ाज ही निराले थे- उनके कमरे में सिंगार मेज़ के ऊपर तरह - तरह का समान रखा रहता था. पांड्ज़ टैल्कम पाउडर, अफ़ग़ान स्नो, पर्फ़्यूम, चूड़ियों का डिब्बा, रंग- बिरंगी काँच के बोतलें, मेकअप का समान और ना जाने क्या -क्या.हमें …

कवर स्टोरी

स्कूल और घर में कोई ना कोई हंगामा लगा ही रहता था- बिलकुल ऐक्शन फ़िल्मों की तरह. मज़ा तो उस दिन आया जिस दिन बंटू उसको ले कर आया.आप सोच नहीं सकते कितना हंगामा मच गया था पूरी क्लास में! सब बच्चे उस की एक झलक देखना चाहते थे. सब लोगों में खुसर- पुसर हो रही थी, लड़कियों में गुपचुप बातें हो रही थी और माहौल कुछ अलग ही लग रहा था. तभी कोई आवाज़ आयी, “आज आने दो शर्मा मैडम को इस बंटू की शिकायत करेंगे, ऐसी चीज़ें कोई स्कूल में लाता है ?” पीछे पलट कर देखा तो बबली अपनी सहलियों से कह रही थी. अरे भाई ऐसा क्या भूकम्प आ गया इस मरियल क्लास में, जो सब उछल रहे थे!
मेरी और जग्गू की समझ से बिलकुल परे था ये हंगामा. भई, हम तो बंटू की लीग में आते ही नहीं थे- कहाँ वो और कहाँ हम! वो तो हमेशा नई- नई चीज़ें लाता था जो उसके लिए उसकी लंदन वाली मौसी और कनाडा वाले मामा भेजा करते थे. जानते हैं, वो भी फ़ोरेन कंट्री घूम कर आया था पिछले साल! उसके पिताजी उसे नेपाल ले गए थे और एक हमारे है, जिनसे हमारी बात करने की हिम्मत ही नहीं होती.हमारे सरसों के तेल से चमकाए बालों की महक की वजह से लड़कियाँ क्या लड़के भी एक हाथ…

गाथा गुसलखाने की

हम गुसलखाने में घुसे नहीं, दादी का प्रोग्राम तुरंत चालू हो जाता था।“ ओ, पिंटू अंदर जा के ब्याह मत जाइयो, फटफट नहा कर आना!” अब दादी को कैसे समझाते की सर्दी के मौसम में गरम पानी से स्नान करने का मज़ा कुछ अलग ही होता है। गरम पानी से निकलती हुई स्टीम हमारे मकड़ी के जाले से सजे और  धूल धूसरित गुसलखाने को थोड़ा- थोड़ा स्टीम रूम बना देती! वही कोने में लकड़ी के त्रिकोण पर रखा सरसो का तेल,संसिलक शैम्पू, हमाम साबुन, नयसिल पाउडर और पापा का शेविंग का सामान हमारे कारनामों के मूक दर्शक होते। हम भी पूरी प्लानिंग के साथ अंदर जाते।अब अंदर जाएँगे और थोड़ा बहुत वक़्त भी लगाएँगे और अपनी बेसुरी आवाज़ में मोहम्मद रफ़ी साहब या फिर किशोर दा के नग़मे भी गाएँगे।
हमारी ख़ुशी से कोई ख़ुश नहीं होता था.बन्नो बुआ को तो मौक़ा चाहिए होता था हमें दादी से डाँट पड़वाने का. जैसे ही तौलिया ले कर आता वैसे ही बन्नो बुआ शुरू हो जाती, “ पिंटू अंदर जा कर बैठ मत जाना जल्दी- जल्दी करना, मुझे बबिता के साथ बाज़ार जाना है.” छाछ बोले तो बोले, छलनी भी! पर हम कौन से सुनने वालों में से थे, बात सुनी भी और नहीं भी।
बाहर आँगन…

बचपन का स्वाद

अब वैसे तो बन्नो बुआ हमारी फ़ेवरेट नहीं थी पर ऐसे मौक़े पर वो हमारा साथ ख़ूब देती थीं। हम बच्चों के साथ वो भी बच्चा बन जाती थीं। हफ़्ते का सबसे स्पेशल दिन होता था वो जब हम सब शराफ़त से अपना स्कूल का काम कर लेते थे, माँ की रसोई के कामों में मदद कर देते थे और दादी से तो बिलकुल पंगे नहीं लेते थे। अब, दादी ही तो हमारे इस प्रोग्राम की फ़ंडिंग करती थी, तो फिर उनसे उलझने का कोई मतलब हो नहीं बनता था। चुपचाप जो -जो काम वे कहतीं हम कर देते थे और बेसब्री से घड़ी में सात बजने का इंतज़ार करते रहते।ऐसे मौक़े का फ़ायदा तो बन्नो बुआ भी ख़ूब उठातीं।"जल्दी जा और रचना के घर से मुझे पीली ऊन के दो गोले ला दे, वरना शाम को जाने के लिए देर हो जाएगी।" मन तो करता की ना कर दूँ पर मरता क्या नहीं करता। बुआ ने ही तो हम बच्चों को शाम को लेकर जाना है तो उन्हें भला कैसे  नाराज़ कर सकते थे।आनन- फ़ानन रचना दीदी के घर से पीली क्या नीली ऊन के भी गोले ले आता! बस उसके बाद क्या इंतज़ार की लम्बी घड़ियाँ- हम सब कभी कहीं बैठते, तो कहीं लुढ़कते और यही सोचते रहते की साथ बजने में इतने टाइम क्यों लगता है।
फिर जैसे ही सात …

मंगलवार का इंतज़ार

हर मंगलवार का हम बेसब्री से इंतज़ार करते थे - शायद औरों के लिए नहीं पर हमारे लिए ख़ास होता था! स्कूल से आकर हम जल्दी- जल्दी अपना होम्वर्क ख़त्म कर लेते ताकि माँ के पास कोई बहाना ना हो हमें अपने साथ ना लेकर जाने का। वैसे तो माँ कभी मना नहीं करती थी पर होम वर्क के मामले बेहद स्ट्रिक्ट थी - अगर काम नहीं करा तो मतलब हमारी हर ऐक्टिविटी निषेध। मंगलवार का दिन दादी का भी ख़ास होता था, वे भी माँ के साथ मिलकर जल्दी से खाने की सारी तैयारी कर लेती। बन्नो बुआ को भी ना चाहते हुए काम करना पड़ता, अब दादी के आगे किसी की भी नहीं चलती थी। "ज़रा जल्दी -जल्दी हाथ चला, काम के वक़्त इतनी ढीली पड़ जाती है, घूमने-फिरने में नम्बर एक।पता नहीं इसकी कामचोरी की आदत कब जाएगी!" बुआ को डाँट पड़ता देख हमें बड़ा मज़ा आता।
शाम को चार बजते ही दादी माँ को हिदायतें देना शुरू कर देती।"जल्दी- जल्दी काम निबटा लेंगे ताकि समय से पहुँच जाएँ, बच्चों को भी तैयार होने को बोल देना वरना घर से निकलने में ही तुम सब लेट हो जाओगे।" अब दादी का हुकुम सर आँखों पर।अब आप सोच रहें होंगे की कोई बहुत बड़े इवेंट के लिए हम सब तै…