Tuesday, October 3, 2017

यादों की अलमारी

उसकी जगह घर में कुछ ख़ास ही थी- एकदम स्पेशल! अंदर वाले कमरे रहती थी वो- और उधर आना जाना सख़्त मना था।बिना माँ की इजाज़त के बिना तो कोई उसके पास भी नहीं जा सकता था! विश्वसनीय सूत्रों से यह पता चला था की वो माँ के साथ उनके मायक़े से आयी है, इसलिए उनकी बहुत ख़ास हैं। बहुत से घर के राज, ज़रूरी बातें वो जानती हैं और उन्होंने सब चीज़ें अपने पास छिपा रखी हैं।तभी, हम जैसों की पहुँच से बिलकुल ही बाहर थी और शायद इसीलिए हमारी जिज्ञासा की लिस्ट पर सबसे टॉप पर भी थी!

सबसे ज़्यादा मज़ा तो तब आता जब काम वाली बाई अंदर वाले कमरे की सफ़ाई करती और माँ उसके पीछे-पीछे साये की तरह घूमती।

काले बैग में पापा की ऑफ़िस के काग़ज़,दादी की पेन्शन फ़ाइल, बैंक की पास बुक, चेक्बुक, हमारे हर साल के रिज़ल्ट,दर्ज़ी के पिछले पाँच साल के पुराने बिल, दूधवाले और प्रेस वाले भैया के बिल, शादी के निमंत्रण पत्र, पंद्रह पैसे वाले ख़ाली पोस्टकार्ड,जनमदिन के कार्ड,तोहफ़ों की पन्नी, विदेश में रहने वाले मामाजी के भेजे हुए ख़त, पुराने चश्मे, कुछ बेरोज़गार पेन, हमारी
 स्कूल की सालाना फ़ोटो जिसमें हम इधर -उधर ताक रहे होते, फ़ोटो अल्बम, गरम कपड़े और बहुत कुछ वो समान जिसके बारे में शायद माँ को भी कोई इल्म नहीं था।


माँ के गहने और सुंदर-सुंदर साड़ियाँ जिन्हें बाहर के दर्शन सिर्फ़ ब्याह - शादियों, पूजा में ही होते थे।शगुन के लिफ़ाफ़े, त्योहारों पर मिले चाँदी के सिक्के, चाँदी के लक्ष्मी-गणेश जो साल में सिर्फ़ एक बार दिवाली पर ही दिव्य दर्शन देते थे!


यह सब और जाने क्या -क्या रखा और सम्भाला जाता था इस गोदरेज की अलमारी में । जो कुबेर के ख़ज़ाने से कुछ कम पर यादों से ज़्यादा भरी रहती थी...

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