Thursday, November 2, 2017

बम्बई वाले मामाजी

इस घटना को तो मैं कभी भूल ही नहीं सकता- अजी, जान बूझ कर नहीं करी थी पर पिटाई तो सॉलिड पड़ी थी! हुआ यूँ की मेरी माँ के बम्बई (उस समय मुंबई को इसी नाम से जानते थे!) वाले मामाजी आए हुए थे। खाने-पीने के बेहद शौक़ीन- जहाँ मौक़ा मिला वही खाने बैठ जाते थे।सिर के बालों ने उनका साथ क़रीब-क़रीब छोड़ दिया था पर अपने बचे-कुचे बालों को साँवरने में वो बहुत समय लगाते थे।एक बार जो शीशे के सामने खड़े होते तो उन्हें वहाँ से कोई नहीं हटा सकता था।अच्छी तरह से ख़ुद को जब तक निहार ना लेते तो नहीं उनको चैन ही नहीं पड़ता था।

सज धज कर निकलते रिश्तेदारों से मिलने के लिए और मुफ़्त का खाना खाने के लिए! मामाजी बहुत कंजूस थे, उनके हाथ से पाँच रुपए भी ना छूटते।बस पहुँच जाते किसी के भी घर और अपनी रसभरी बातों में सबको उलझाए रखते। फिर उनके घर से बिना अपनी सेवा करवाए तो निकलते ही नहीं- ख़ूब दबा कर पकवान उड़ाते और कहते रहते,"रहने दे बेटा, अब बुढ़ापे में इतना तला हुआ खाना नहीं पचता।पर अब तू इतने प्यार से खिला रही है तो मैं तेरा दिल भी तो नहीं तोड़ सकता।" यह कहते-कहते ही ५-७ पूरी, कचौरी, बेडमी, हलवा, बादाम का दूध सब डकार जाते! हम सब लोग हैरान होते की इतने पतले दुबले मामाजी की कितनी ज़्यादा कपैसिटी है। लेकिन मामाजी का खाने-पीने का प्रोग्राम यहीं समाप्त नहीं होता वो आन गोइंग रहता!

जैसे मामाजी सुशीला मौसी के घर से निकलते, तो विनोद चाचा के घर का रास्ता पकड़ लेते।"अब दिल्ली आया हूँ तो विनोद से भी मिल लूँ, बहुत दिन हो गए उसे देखे हुए ।" उनके घर पहुँचते ही,"जा बेटा एक ग्लास पानी ले आ और फिर मेरे लिए शिकंजी बना देना- लगता है सुशीला के घर कुछ ज़्यादा ही खा लिया।" शिकंजी का ग्लास मेज़ पर रखा नहीं और मामाजी शुरू हो जाते, "बेटा ख़ाली शिकंजी नुक़सान करेगी, जा कुछ खाने को भी ले आ।" फिर जैसे ही मेज़ पर खाने का सामान आता सूपर फ़ास्ट ट्रेन की तरह खाना शुरू कर देते। हम लोग हैरानी से एक दूसरे का मूँह ताक रहे होते और यह सोचते की इनका पेट है या कुआँ! पर मामाजी को तो किसी बात का कोई फ़र्क़ ही नहीं पड़ता-उनके दिमाग़ में तो आगे की प्लानिंग चल रही होती।

घर से निकलते ही मामाजी माँ को बोलते," देख आज रात को तू ज़्यादा कुछ मत बनाना मेरे लिए- बस ऐसा करना की मूँग की दाल,मेथी के पराँठे, ज़ीरा आलू, हरे धनिए की तीखी चटनी और खीर बना लेना। मुझे रात के टाइम ज़्यादा भारी खाना पसंद नहीं है।" हम सिर खुजाते हुए सोचते की अगर ये हल्का खाना है तो फिर भारी कौन सा होता है! घर आकर माँ ने जल्दी से खाना तैयार कर दिया और हमें विशेष निर्देश दिया की खीर मेज़ पर ठंडी होने के रखी है और हम बिल्ली को उसके पास ना आने दे। हम खेल में मशगूल थे, कुछ सुना कुछ नहीं। अब खीर कब बिल्ली का नैवैद्य बन गयी हमें मालूम ही ना पड़ा! हमने चुपके से झूठी खीर उठा कर रसोई में ढक कर रख दी।

इतने में मामाजी खाने के लिए आ गए- माँ ने उन्हें खाना परोसा तो वो बोले, "बेटा मैं तो सबसे पहले मीठे से शुरू करूँगा, ला मुझे खीर दे दे ।" जैसे ही उन्होंने ठंडी खीर की चम्मच मूँह में डाली, वैसे ही उनके मूँह में आया बिल्ली की मूँछों का बाल! अब ना तो खीर खाते बनी नहीं ही थूकते, बस ग़ुस्से से हमें घूरते हुए कमरे से बाहर निकल गए।और हम ये सोचते रह गए की अगर बिल्ली खीर पहले टेस्ट कर गयी तो इसमें हमारा क्या क़सूर!

लेकिन माँ ने तो कुछ भी सुनने से इंकार कर दिया और ऐसी पिटाई लगाई जो हमें आज तक याद है!

बचपन की मिठास

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