Saturday, February 20, 2021

बिजली का जाना

गर्मियों में जब बिजली चली जाती उस दिन तो मानो गली में रौनक़ ही लग जाती- बच्चे अपने स्कूल का काम छोड़ कर खेलने आ जाते, घर के बड़े- बूढ़े घर के बाहर चारपाई पर बैठ इधर उधर की बातों में लग जाते, पिताजी और उनके दोस्त आँगन में बैठ देश की राजनीति पर चर्चा करते और माँ और उनकी सहेलियाँ मोमबत्ती की रोशनी में फटाफट रोटी सेंक रही होतीं ताकि वे सब भी आपस में गपशप कर सके.
अब बिजली जाने का तो पता चल जाता पर बिजली देवी कब आएँगी यह तो सिर्फ़ विद्युत विभाग ही जानता- भले कितने ही फ़ोन लगा लो, वहाँ से सिर्फ़ यही उत्तर मिलता, “ पीछे के ट्रैन्स्फ़ॉर्मर में कुछ ख़राबी है, कितनी देर तक ठीक होगा मालूम नहीं. धन्यवाद.”

बिजली के जाने सबसे ज़्यादा ख़ुशी हम बच्चों को होती- होम्वर्क से छुट्टी मिल जाती और बाहर खेलने के लिए मौक़ा. अब मौक़े पर चौका लगाना तो हमें बखूबी आता, जानबूझ कर वहीं बड़ों के इर्द - गिर्द चक्कर लगाते रहते, वहीं धमा चौकड़ी करते. जिससे हार थक कर वे हमें अपने पास बुला पैसे देते और बोलते,” ये लो पैसे और बनवारी की दुकान से आइसक्रीम ले आओ.” हम को भी तो इसी मौक़े की तलाश रहती- झटपट पैसे पकड़ सारी वानर सेना बनवारी की दुकान की तरफ़ लपकती. 

बिजली जाने से सबसे ज़्यादा फ़ायदा बनवारी का होता था- मोहल्ले के सारे बच्चे उसकी दुकान पर आइसक्रीम और ठंडी-ठंडी कोका कोला लेने के लिए मक्खियों के जैसे मंडराते. दुकान के बाहर बेंच पर बैठ हम मज़े से आइसक्रीम चूसते और एक भी बूँद टपकने ना देते चाहे कुछ भी हो जाए. आइसक्रीम खाने के बाद इंस्टंट एनर्जी आ जाती और फिर हम सारे घर की ओर दौड़ लगाते- चारपाइयाँ लांघते हुए, गली के बीच में ऊँघते हुए कुत्तों को टापते हुए, बंटू के छोटे भाई की तिपहिया के ऊपर से कूदते हुए और बन्नू की बुआ की डाँट खाते हुए सीधे पहुँचते घर के आँगन में जहां सब  बैठे होते.

और फिर शुगर स्पाइक के बाद शुरू करते अपनी बदमाशियाँ, कभी इधर चढ़ - कभी उधर, कभी माँ के पीछे छिप जाना और कभी बन्नो बुआ को तंग करना, पुरानी कॉपी के पन्ने फाड़ हवाईजहाज़ बना और हाथ में पकड़ पूरे बरामदे और आँगन के चक्कर काटना.पिताजी की झाड़ खा कर मोमबत्ती की लौ पर मंडराते हुए कीट-पतंगों को देखना, बड़ों की आँख बचा अपनी उँगलियों से पीली-नारंगी गरम लौ को पकड़ने की कोशिश करना, काग़ज़ के लम्बे -लम्बे रिबन बना उन्हें मोमबत्ती पर लटका के जलाना और फिर उसके काले, जले अवशेषों को फूँक मार उड़ाना- ज़िंदगी बहुत ही सीधी और सरल थी. 
जैसे ही थक जाते आँगन में बिछी चारपाई पर आकार लेट जाते और आसमान में बिखरे अनगिनत तारों को तब तक गिनते रहते जब तक आँखों के दरवाज़े पर नींद की दस्तक ना हो जाये. 
बिजली के आने ना आने का कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, चाँद-तारे देखते-देखते ही रात निकल जाती इतनी. 
इतनी सुकून की नींद सोते थे हम!

आज ऐयर कंडिशनर की ठंडी हवा में सोते ज़रूर हैं पर ना आँखों में नींद है और ना दिल में सुकून,सिर्फ़ दिमाग़ पर ढेरों परेशनियाँ और अकेलेपन के सन्नाटे का बोझ...






Tuesday, February 16, 2021

बूढ़ी बेबे

गली के कोने में बूढ़ी बेबे का मकान हुआ करता था - समझ में नहीं आता की कौन ज़्यादा बूढ़ा है- बेबे या मकान! दोनों ही कमाल के स्ट्रोंग थे- कितनी भी ज़ोर से बारिश आए, सख़्त गर्मी पड़े, कंपकंपा देने वाली ठंड आए या ज़ोरदार धूल भरी आंधियाँ चले मजाल है की उनके मिज़ाज में कुछ ऊनीस-बीस का भी फ़र्क़ आए.बेबे की ज़ुबान की तल्ख़ी और मकान की बेरंग होती हुई जानदार दीवारें सब पर बहुत भारी पड़ती थी.


हमें लगता था बेबे अकेले रहती थी- फिर पता चल की उनके शौहर ऑटो रिक्शॉ चलाते हैं और बिल्कुल निरीह गाय समान हैं- बीवी के सामने चूँ भी नहीं करते या फिर शायद उनको मौक़ा ही नहीं मिलता. सारे दिन दिल्ली की सड़कों पर ऑटो चलाते और देर रात शराब पीकर आते. खाना के साथ बेबे की खूब सारी गालियाँ खा के शहतूत के पेड़ के नीचे अपनी चारपाई लगा कर सो जाते हैं. शायद बेबे की कड़वी ज़बान के गोलियों से बचने के लिए पीते थे- होश में रहते तो फिर रोज़ घर में पानीपत का युद्ध होता और पूरा मोहल्ला दर्शक!
ग़ज़ब की हिम्मत थी बेबे में- सब कुछ उनके कंट्रोल में था! घर, पति, बच्चे, दूर- पास के रिश्तेदार और हमारा गली- मोहल्ला भी. उनके दो बेटे पर कोई उनके साथ नहीं रहता था -  इतनी गालियों और डाँट झेलने के लिए बहुत बड़ा दिल भी तो चाहिए.उनके लड़के २-४ महीने में कभी एक बार अपने माँ- बाप से मिलने आते थे.

लेकिन उनके साथ उनकी पोती बबली रहती थी- बेबे उसे बेहद प्यार करती थी. उसके लिए मोहल्ले वालों से झगड़ना उनका रोज़ का काम था.मज़ेदार बात तो यह है बबली बिल्कुल अपनी दादी हूबहू ज़ीरॉक्स थी- एक नम्बर की  लड़ाकी, झगड़ालू और चिलम्मचिल्ली करने वाली- शायद यही कारण था की गली में रहने वाला कोई भी बच्चा उसके साथ खेलना नहीं चाहता था. साथ ना खेलो तो मुसीबत, खेलो तो मुसीबत- हम सबकी नाक में दम कर रखा था बेबे और बबली ने. अगर हम खेलना शुरू कर देते तो वो अपनी दादी के साथ बिन मौसम की बरसात के जैसे टपक पड़ती और फिर बेबे हमें पंजाबी गलियों से नवाज़ती! दिल पर पत्थर रख उसे टीम में शामिल कर मजबूरन खेल खतम होने तक झेलना पड़ता क्योंकि बेबे गिद्ध की तरह हम पर आँखें गड़ायें बैठी होती. 

भले ही बेबे बहुत कड़े स्वभाव वाली थी पर दिल की बहुत अच्छी थी. बिल्कुल अखरोट जैसी- ऊपर से सख़्त और अंदर से नरम! जैसे ही पेड़ मीठे लाल- हरे शहतूतों से भर जाता, अपनी चारपाई पर बाहर बैठी सब बच्चों को आवाज़ लगती, “ स्कूल से आने के बाद तुम सब शहतूत तोड़ कर ले जाना- बहुत मीठे हैं और थोड़ा-थोड़ा हलवा भी खा कर जाना, तुम सब के लिये बना कर रखूँगी.” हमें कभी भी उनका यह सर्द-कभी गर्म हवा का रुख़ समझ में नहीं आया.

धीरे-धीरे वक्त गुजरता रहा, फिर गली से ज़्यादा समय कमरे में पढ़ाई करते हुए बीतने लगा. जब कभी बेबे दिख जाती तो उन्हें नमस्ते कर निकलते तो बदले में खूब सारा आशीर्वाद मिल जाता. स्कूल से कॉलेज, कॉलेज से नौकरी और वो भी दिल्ली के बाहर- फिर उस गली से नाता ही छूट गया जब पिताजी का ट्रान्स्फ़र मुंबई हो गया. कुछ साल मुंबई में बीतने के बाद माँ और पिताजी भी मेरे पास अमेरिका आ गया- फिर तो जैसे अपनों से क्या देश से भी बहुत दूर हो गया.

बचपन की यादें और बातें सिर्फ़ एक क़िस्सा बन कर रह गयीं- कभी कोई पुराना यार-दोस्त फ़ोन करता तो ऐसा लगता मानो समय रुक गया है और हम फिर से बच्चे बन गए हैं. बातों में वो ही बचपन की मस्ती, शरारत और बदमाशियों का लज़ीज़ फ़्लेवर फिर से बेस्वाद लाइफ़ को टेस्टी बना देता. 
कभी- कभी मन में आता की एक बार जा कर देखूँ वो गली, घर का आँगन और पुराने दोस्त कैसे हैं जिन के साथ बचपन के ख़ूबसूरत पल बितायें हैं और फिर एक दिन मुझे वो अवसर मिल ही गयाकम्पनी के एक प्रोजेक्ट के लिए मुझे दिल्ली भेजा गया और शायद यही एक मौक़ा था मेरे पास पुरानी यादों को फिर से ताज़ा करने का.
मैंने बिट्टू को फ़ोन किया और कहा, “ क्या हम पुराने घर जा सकते हैं, बहुत बरस हो गए देखे हुए.” बिट्टू मेरा सबसे ख़ास दोस्त है और जगह की दूरी से हमारी दोस्ती में कोई फ़र्क़ नहीं आया है. आज भी हम एक दूसरे के जिगरी हैं!
बिट्टू ने मुझे होटेल से पिक किया और बाइक पर बैठा के ले आया यादों की गालियों में - जहां बचपन आज भी खूब शरारतें करता है, खट्टी- मिट्ठी नौंक- झौंक धूप सेंकती है, आशीर्वाद और तजुर्बे की गरमाहट से भरे हाथ आज भी सिर सहलाते थकते नहीं है और प्यार के मर्तबानों को सम्भाल कर रखा जाता है. 

इन सब की बीच में मुझे से सबसे ज़्यादा कमी खली तो वो थी सफ़ेद चुन्नी ओढ़े और मुँह में गालियाँ और दिल में ढेर सा प्यार रख़ने वाली बेबे की! सब कुछ शायद वैसा ही था पर बेबे नहीं दिखी.
भारी मन से यादों की गली से निकल तो गया पर जब पलट कर देखा तो ऐसा लगा की शहतूतों से लदा पेड़ मकान में मानो बेबे बन मुट्ठी भर-भर कर प्यार की मिठास दे रहा हो.

बचपन की मिठास

हमारे घर के पास के बहुत बड़ा पीपल का पेड़ था और बग़ल में सुरेश हलवाई की दुकान थी- एक तरफ़ विशालकाय कड़ाई में दूध उबलता रहता और दूसरी तरफ़ वो...