Tuesday, February 5, 2019

होली के रंग

जैसे ही त्योहारों का मौसम आता हम सब बहुत ही उत्साहित हो जाते, अब कोई रोज़ रोज़ त्योहार थोड़े ही आते हैं! वैसे तो हमें सब त्योहार पसंद थे पर होली हमारा फ़ेवरेट था। सबसे मज़े की बात उस दिन दादी, माँ या बन्नो बुआ हमें कुछ भी नहीं कहती और हमें शैतानी करने का लाइसेन्स मिल जाता। दो -तीन दिन पहले से घर में बढ़िया पकवान बनने शुरू हो जाते- जैसे ख़स्ता मठरियाँ, नमकपारे, बेसन के लड्डू, नमकीन सेव और नारियल -मेवा भरी गुँझिया। पूरा घर इन स्वादिष्ट पकवानों की ख़ुशबू से महक उठता। हम अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश लगा कर रसोई से कुछ ना कुछ चुराने की फ़िराक़ में लगी रहते और मिशन फैल होने पर दादी के प्रवचन भी सुनते।" कंबख़्तो, कितनी बार मना किया है, मठरी-लड्डू छोटी होली वाले दिन पूजा के बाद मिलेंगे, पर तुम नासपीटे सुनते नहीं हो!" दादी हड़का कर हमें रसोई से बाहर कर देती थी। यह तो हुई खाने की बातें, अब सुनिए हमारी होली की तैयारी के बारे में। माँ के साथ जा कर हम गुब्बरों के बड़े- बड़े पैकेट ले कर आते, साथ में गोली वाले पक्के रंग और गुलाल भी।दो- तीन दिन पहले से बड़े -बड़े प्लान बनने शुरू हो जाते- कितने ग़ुब्बारे तैयार करने हैं, रंग वाला पानी कौनसी बालटी में रखना है, पक्के रंग किस- किस को लगाने हैं और ना जाने क्या-क्या! होली से पहले ही हमारी बदमाशियाँ शुरू हो जातीं- गली में आते जाते लोगों पर ग़ुब्बारे फेंकना, चुपके से रंग लगाना और मस्ती करना। हम तो घर की दीवारों को भी नहीं छोड़ते थे! अलग-अलग रंग हाथों पर लगा दीवारों पर छापे बनाते तो हर दीवार यही कहती,"अरे बच्चों अभी तीन महीने पहले ही तो दादी ने सफ़ेदी करवायी थी, क्यों हमारा सत्यनास कर रहे हो?" पर जनाब हमने तो कभी किसी की सुनी कहाँ! होली से चार-पाँच दिन पहले की बात है, बंटू चाचा ख़ूब सज-धज के पिताजी से मिलने हमारे घर आए। बातों बातों में उन्होंने पिताजी को बताया की वो मेरठ जा रहे है। उस दिन चाचा ने बढ़िया सिल्क का कुर्ता और पजामा पहना हुआ था और एकदम हीरो लग रहे थे! वो बैठक में पिताजी से बातें कर रहे थे , उधर माँ उनके खाने-पीने का समान परोस रही थी। हम बच्चों ने जैसे ही चाचा को बरामदे की खिड़की से झाँका, हमारे खुरपाती दिमाग़ में एक धमाकेदार विचार आया। अब होली पर चाचा नहीं होंगे, क्यों ना आज ही उनके साथ रंग-मिलन कर ले! बस सब के सब सोचने लगे की किस तरह चाचा को बाहर निकलते ही हम घेरें।अब पिताजी के रहते ये काम मुश्किल तो था पर नामुमकिन नहीं। हमने तय किया कैसे ना कैसे बंटू चाचा को तो रंगना ही है, बाद में देखेंगे क्या करना है। जैसे ही खा- पी कर चाचा कमरे से बाहर निकले हम सारे बच्चे उन्हें मिलने पहुँच गए। हम सब ने गीले हाथों पर पक्का गुलाबी,हरा,नीला और जामुनी रंग लगा रखा था।जैसे ही चाचा ने दरवाज़े की तरफ़ रूख किया वैसे ही हम सब ने उनकी पीठ को कैन्वस बना कर उस पर रंग-बिरंगे छापे बना दिए। चाचा का झक सफ़ेद कुर्ता देखते ही देखते एम एफ हूसैन की पेंटिंग में तब्दील हो गया! और फिर उसके आगे का हाल हम बयान ना कर पाएँगे, बेहतर हो गया की आप रीडर्ज़ ही ख़ुद समझ ले की कहानी किस तरफ़ मुड़ी होगी!

बचपन की मिठास

हमारे घर के पास के बहुत बड़ा पीपल का पेड़ था और बग़ल में सुरेश हलवाई की दुकान थी- एक तरफ़ विशालकाय कड़ाई में दूध उबलता रहता और दूसरी तरफ़ वो...