Friday, April 2, 2021

मैगज़ीन की मेहरबानी

आज क्लास में कुछ ज़्यादा ही शोर-शराबा हो रहा था, ऐसा जान पड़ता था की हम मच्छी बाज़ार में खड़े हैं. हर तरफ़ से चिल्ल- पों ही सुनाई पड़ रही थी. एक तो बस लेट आयी, ऊपर से कंडक्टर अंकल की डाँट अलग पड़ी और फिर क्लास में घुसते ही ये शोर -  लगता है आज का दिन कुछ अलग ही होगा.
बैग को डेस्क पर रख जैसे ही मैं पीछे मुड़ा,तैसे ही कपिल के आवाज़ आयी, “ ओए, जल्दी आ तेरे कुछ दिखाना है .” ऐसा क्या है जिस के लिए इतना बेसब्रापन हो रहा है, कुछ समझ नहीं आया. मैंने खुद को रिवर्स गेयर में डाला ही था तभी वाइस- प्रिन्सिपल सर ने एंट्री मारी- उन्हें देखते ही सब तरफ़ सन्नाटा छा गया और अचानक से सारी क्लास एकदम सुव्यवस्थित हो गयी. हम सब अपनी सीटों पर संस्कारी, सदाचारी बालकों जैसे जा कर बैठ गए. क्लास मछली बाज़ार से बदल कर कोलाहल रहित ज़ोन में तब्दील हो गयी.


“ वेरी गुड बच्चों! बिल्कुल ऐसे ही समझदार बन आगे के दो पिरीयड्ज़ बिताने हैं. शर्मा मैडम आज नहीं आयीं हैं और उन्हें रिप्लेस करने के लिए कोई दूसरी टीचर नहीं है. इसलिए ये दो तुम्हारे फ़्री पिरीयड हैं- चुपचाप सब लोग सेल्फ़-स्टडी करेंगे .” यह सुनते ही हमारी बाँछे खिल गयी. अंधा क्या माँगे दो आँखें! आज तो यह मुहावरा सही से समझ आ गया. हमारी तो मन की मुराद पूरी हो गयी- हम तो दिल ही दिल में दुआ माँग रहे थे की कोई फ़्री पिरीयड मिल जाए तो देखें की कपिल और उसके ग्रूप के लड़के हमें क्या दिखाने के लिए बुला रहें हैं. सच में भगवान होते हैं और हम जैसे नन्हे-मुन्ने, मासूमों की बात भी सुनते हैं.


वहाँ सर ने एग्ज़िट किया, यहाँ हमारी बदमाशियों ने एंटर! सब अपनी सीटों से उठ कर इधर-उधर बिखर लिए. क्लासरूम जैसे लड़कों और लड़कियों के बीच में बँट गया था- सारी लड़कियाँ और पढ़ाकू बच्चे आगे और हमारे टाइप वाले यानी शरारती, बदमाश और शरीर बच्चों ने पीछे की सीटें सम्भाल ली थी. हमें जिज्ञासा पीछे की और खींच के ले गयी जहां हमारी क्लास के धुरन्धर बैठे हुए थे. नहीं, नहीं जिज्ञासा किसी लड़की का नाम नहीं है! हमें तो हमारी प्रबल इच्छा पीछे खींच रही थी क्योंकि हम वो सब मिस नहीं करना चाह रहे थे जिसे बाक़ी सब देखने वाले थे. “ कुछ तो है बंटी, नहीं तो ये सारे इतने उतावले नहीं होते. शायद वो छिब्बर भी कुछ लाया है, कोई मैगज़ीन मालूम होती है,” मैंने रूपक से कहा.रूपक ने पीछे देख कर इग्नोर कर दिया और झट से बोला, “ तुझे जाना है तो जा, मुझे कोई इंट्रेस्ट नहीं है.”


तभी क्लास मॉनिटर, दीपा ने मुझे अपनी सीट पर वापिस जाने का इशारा किया. उसकी बात मानना तो ज़रूरी था वरना प्रिन्सिपल सर के पास जाने वाली लिस्ट में मेरा नाम भी जुड़ जाता.अपनी सीट पर वापिस आ कर मैंने क्लास पर नज़र डाली, जिसका आँखों देखा हाल मैं आपके साथ शेयर करता हूँ. 

चलिए आगे से शुरू करते हैं- सबसे आगे क्लास के टापर्ज़ बैठ कर डिस्कशन कर रहे थे और एक दूसरे की कठिन सम्ज़ को करने में मदद कर रहे थे. हम तो उनके लेवल तक अपने सपनों के सपनों में भी नहीं पहुँच सकते थे. वो सब तो बिल्कुल अलग ही थे- नो नॉन्सेन्स टाइप्स! इन की वजह से हमें दुनिया, समाज ! ना, ना क्लास और घर में ताने सुनने पड़ते थे. “ निकम्मों, सारा टाइम बर्बाद करते हो. पढ़ाई के नाम पर गोल अंडा! साँवली, धीरज, संजीव को देखो- सौ में सौ लाते हैं. एक तुम! पास हो जाओ तो ग़नीमत है!” मन में आते की कह दें की जान लोगे क्या बच्चे की!  अब सौ की हमारी औक़ात नहीं है. हम तो बहुत सब्रवाले हैं, पचास-साठ में खुश हो जाते हैं. पर बहुत सी बातें दिल में ही रह जाती.


थोड़ा पीछे आते हैं, कुछ है क्लास में पेंटर बाबू जिन्हें यह दो पिरीयड में मौक़ा मिल गया अपने मास्टरपीसेज़ को पूरा करने का- डेस्क पर रंग फैला कर खुद को पिकासो से कम नहीं समझ रहे थे. उनके साथ वाली सीट पर बैठी सपना, रितु और वंदना गप्पें मारने में बिज़ी तो उधर दिव्या लाइब्रेरी बुक में पूरी तरह से घुसी हुई थी. यार, इस क्लास में अजीब-अजीब से नमूने भरे पड़े हैं!आगे बैठने वाले सारे बच्चे बेहद तहज़ीबदार, पढ़ाकू और संस्कारी टाइप्स और पीछे बैठने वाले सब एक से बढ़कर एक!


इतने में दीपा को हिस्ट्री की टीचर ने क्लास के बाहर बुलाया और मेरे पास यही एक मौक़ा था पीछे जाने का. जैसे ही मैं पीछे पहुँचा तो देखा कपिल चारों तरफ़ से क्लास के लफ़ंगो से गिरा हुआ था- सब की नज़रें उसकी हाथ में पकड़ी हुई मैगज़ीन पर ही टिकी हुई थी. सब मज़े ले -ले कर देख रहे थे. मुझे देखते ही कपिल बोला, “ फटफट आ, नहीं तो बहुत कुछ मिस हो जाएगा .”  जैसे ही मेरी निगाह मैगज़ीन के खुले पन्नों पर पड़ी मेरी तो सिट्टी- पिट्टी गुम हो गयी! 

ये क्या! प्लेबॉय! अडल्ट मैगज़ीन! 

“ कहाँ से लाया इसे?” मैंने कपिल से पूछा. “ तुम आम खा, गुठलियाँ क्यों गिनता है?”, उसने मुझे से हंसते हुए कहा.
अचानक से मुझे फ़ील हुआ की मेरे पैरों तले से धरती खिसक रही है, क्लास में सब कुछ घूम रहा है- ख़ुशी और डर का काक्टेल हो गया था. तभी मेरे कंधे पे घूमते हुए उस अदृश्य शरीफ़ फ़रिश्ते ने कहा,  नीटू, ये समय सही नहीं - बेटा चुपचाप निकल ले, वरना लेने के देने पड़ जाएँगे.” मेरे आगे बढ़ते क़दम वही रुक गए और अपने दिल पर पत्थर रख मैं पीछे की तरफ़ पलट लिया. मैं चुपके से वहाँ से निकलकर अपनी सीट पर आ गया और किताब पढ़ने लगा. कपिल ने मुझे इशारा भी किया पर मैंने उसे मना कर दिया. 

सब के सब झुंड बना कर मैगज़ीन देख ही रहे थे इतने में हिंदी पढ़ाने वाले ठाकुर सिर ने एंट्री मारी. “ तुम्हारी कक्षा-संचालक कहाँ है ? और वहाँ पर क्या त्योहार मनाया जा रहा है चलिए बताइए?,” यह कहते-कहते सर कपिल की सीट पर पहुँच गए और बेचारा कपिल उसे तो मौक़ा भी ना मिला मैगज़ीन छिपाने का और खुद को बचाने का!

फिर आगे की दास्तान ना पूछे तो बेहतर होगा. कपिल और उसके साथ-साथ बाक़ी सब लड़कों की जो सुताई हुई उसका विवरण मैं ना दे पाऊँगा, ऐसा जान पड़ता था की बॉलीवुड के ऐक्शन मास्टरों ने हमारे स्कूल की इस धुलाई- सुताई प्रोग्राम से प्रेरित हो कर ही अपने आने वाली फ़िल्मों के ऐक्शन सीन तैयार करे होंगे. आख़िर कोई इन्स्परेशन भी तो होनी चाहिए! 

फिर प्रिन्सिपल रूम के दर्शन और उसके बाद वॉर्निंग लेटर!  

कपिल और उसके दोस्तों ने कभी सोचा भी ना था की उनकी लाइफ़ ही एक ओपन बुक, नहीं मैगज़ीन बन जाएगी, जिसे कोई भी पढ़ने में इंट्रेस्टेड नहीं होगा...

Tuesday, March 30, 2021

हवा हवाई

मैं आपके साथ एक बहुत ही धमाकेदार क़िस्सा शेयर करना चाहता हूँ और यक़ीन मानिये इस घटना की वजह से हमारी ज़बरदस्त मरम्मत हुई की हम को अंतरिक्ष के सारे प्लानेट्स नज़र आ गए. हुआ यूँ दिवाली के दिन थे- हर किसी के घर कहीं ना कहीं से पटाखे और मिठाइयाँ आ रहीं थी और सबसे ज़्यादा ऐश बच्चों की हो रही थी. सबके पास पटाखों का ख़ज़ाना जमा होता जा रहा था. राजू के चाचा की पटाखों की दुकान थी - तो सबसे मस्त और नये टाइप के पटाखे उसके पास थे- बड़े वाले अनार और चकरी, सतरंगी पेन्सल, सुनहरे तारों वाली फूलझडी और ना जाने क्या - क्या! अब घर की दुकान होने का कुछ तो फ़ायदा होगा. बंटू के पास रंग-बिरंगी लम्बी तार, काले बटन जिसे माचिस से जलाओ तो ये लम्बे-लम्बे काले सांप बन जाये और मोटे वाले आलू बम. सन्नी के पास हरे गोला बम और खूब सारी फूलझड़ियाँ!
हमारे पास भी पटाखों का बड़ा ख़ज़ाना था पर हम ने किसी को उसकी भनक भी ना लगने दी, वरना सबसे पहले हमारे ही पटाखे स्वाहा हो जाते! हम भी बहुत उस्तादी से एक- एक करके अपने पटाखे निकलते और मज़े ले कर चलाते. परसों जब चमन चाचाजी घर आए तो हमारे लिए रसमलाई, काजू कतली और ढेर सारे पटाखे के कर आए थे. लम्बी- लम्बी फूलझडी, जंबो चकरियाँ, मिनी अनार और मैजिकल हवाई! ये हवाई थी ही कुछ अलग टाइप की- पूँछ में आग लगा दो तो सीधे आसमान में जा कर इंद्रधनुष के रंग वाले सितारे फेंकती और पूरे पाँच मिनिट के लिए सब तरफ़ चमकीली रोशनी बिखेर देती.
हम जैसे ही उसकी की ओर अग्रसर हुए पीछे से एक आवाज़ आयी, “ ख़बरदार हवाई को हाथ मत लगाना. दूसरे पटाखे ले कर जाओ. इसे कोई बड़ा तुम्हारे लिए चलाएगा- तुम लोग इस को हैंडल ना कर पाओगे.”
यह बात हमें हज़म ना हुई- हजमोला खा कर भी नहीं!
कोई भी हम पर पाबंदी लगाए, सवाल ही नहीं उठता! अब हमारा ख़ुराफ़ाती दिमाग़ हवाई चलाने के लिए नयी-नयी तरकीबें  सोचने पर आमादा हो गया.
फिर आपस में सलाह करके हम ने डिसाइड किया हमारे पास चोरी के अलावा कोई और रास्ता ही नहीं है- जानते हैं चोरी करना ग़लत है पर दिवाली को और चमकदार बनाने के लिए सब कुछ जायज़ है. हमारे सामने सबसे बड़ी प्रॉब्लम थी की दुश्मन के ख़ेमे में कैसे घुसे और चोरी करें! चारों तरफ़ सख़्त पहरा - दादी, बन्नी बुआ, पिताजी, माँ और मुक्कु चाचा की नज़रों से बचना मुश्किल ही नहीं बेहद नामुमकिन भी था. पर जब हम एक बार कमिट्मेंट कर देते हैं तो अपनी भी नहीं सुनते!
सिर्फ़ हम ये अच्छे से जानते हैं की, “ हम किसी से कम नहीं!”

इक्स्क्यूज़ में! ये सिर्फ़ फ़िल्मी टाइटल नहीं हम बच्चों की सच्चाई है. अब कुछ भी करके उमे पिताजी के कमरे में जाकर हवाई का पैकेट उठाना है. सबने  मिल कर ब्रेन स्टोर्मिंग की और तभी दिमाग़ का बल्ब चमक उठा- हर रावण की लंका में कोई ना कोई विभीषण होता है तो फिर हमारी लंका, ना-ना! हमारे घर का विभीषण कौन? माँ - नहीं वो तो कभी हमारी बात कभी नहीं मानेगी, गुड़िया दीदी - उफ़्फ़! एक नम्बर की चुगलख़ोर है, चिंटू भैया- ग़ुस्सा तो उनकी नाक पर रहता है, सपना चाची - ऑल इंडिया रेडिओ से ज़्यादा से ज़्यादा तो वो ख़बरें दे देती हैं! अब हम नन्हें- मुन्नों की नैया कौन पार लगाएगा ?

तभी हमने देखा की हमारी इस विकट समस्या का हल ख़ुद ही चल कर हमारे पास आ रहा है.कविता मौसी और कमल मौसाजी बरामदे में खड़े थे और सबको दिवाली की बधाई दे रहे थे.हमारे लिए  मिठाई और ढेर सारे पटाखे भी लेकर आए थे और शायद इसीलिए हम उनसे मिलने के लिए हम बहुत बेताब हो रहे थे.मैं चुपके से मौसी के पास गया और उनसे रिक्वेस्ट की किसी तरह से वो हमारी मदद कर दें और हमें अपने लक्ष्य यानी हवाई के पैकेट तक पहुँच दे. अब उम्मीद पर तो दुनिया टिकी है! मौसी ने मौसाजी से कुछ कहा और वे तुरंत ही पिताजी की तरफ़ मुड़े और बोले,“ भाईजी दिवाली का असली मज़ा मिठाई से ज़्यादा तो पटाखे चलाने में है - चलिए एक बार फिर से बच्चा बन जाते हैं.” उनकी बात पिताजी कभी टाल नहीं सकते थे और हमें आवाज़ दे कर बुलाया,  जाओ टेबल से पटाखे उठा लो, सिर्फ़ फूलझडी और अनार, राकट को हाथ मत लगाना.”  हमने आँखों ही आँखों मेओं एक दूसरे से मेसिज इक्स्चेंज किया और आज्ञाकारी बालकों के जैसे गर्दन हिला कर जी पिताजी बोल दिया. पिताजी तो हमारी इस खुरापात की खिचड़ी से बिलकुल ही अनजान थे! हम मेज़ पर रखे पटाखे उठाने ही जा रहे, इतने में मौसाजी ने पिताजी को आवाज़ दे कर बुला लिया- यानी मैदान क्लीर! अब लम्बा हाथ मारने का टाइम था. झटपट से कुछ फूलझड़ी, चकरी, अनार के साथ दो हवाई भी उठा लीं.

सामने से माँ आती दिखाई दी तो गप्पू ने झट से अपनी क़मीज़ के अंदर हवाई छिपा ली. माँ ने गप्पू को देखा तो बोली, “ ऐसे इठला कर क्यों चल रहा है? तेरी क़मीज़ में चिटियाँ घुस गयी हैं क्या ? ” हमारे तो मुँह में मानो दही जम गया हो! तभी कविता मौसी की एंट्री हुई और माँ का हाथ पकड़ कर बोली,  जीजी क्या तुम भी बच्चों से उलझ रही हो ? मेरे साथ चलो तुम्हें अम्माँजी बुला रहीं हैं. ” 

उस समय मौसी हमें साक्षात् दुर्गा माँ का अवतार लग रहीं थी जो अपने पीड़ित भक्तों की रक्षा के लिए आयी थीहमें सब आँगन लांघ के दौड़े गली में सब के संग पटाखे चलाने के लिए

बिल्लू ने जैसे ही हमारे पटाखे देखे तो एकदम भौंचक्का हो गयाबड़ीबड़ी फूलझड़ी और सतरंगी चकरियाँ उसके पास नहीं थी.

हमारे पास हवाई है.तुम्हारे पास क्या है ?” 

हमने झट से बच्चनजी के लहजे में सबसे पूछ डाला!इस सवाल का जवाब गली में किसी बच्चे के पास नहीं थाक्योंकि किसी को भीहवाई चलाने की इजाज़त नहीं थीहवाई को काँच की ख़ाली बोतल में सीधा रख उसकी पूँछ में आग लगायी जाती थीऔर अगर ज़रा भी टेढ़ामेढ़ा हो जाती तो दिशाहीन हो किधर का भी रुख़ कर लेती.


अब चाहे वो किसी का आँगन होदुकान या फिर?

जी हाँयहीं सी दिवाली की दास्तान का रुख़ बदलने वाला हैहुआ यूँ की जब 
हम ने छोटे - मोटे पटाखे चला लिए तो ये तय किया जिस हवाई के लिए हमने 
इतने पापड़ बेले थे उसे आसमान की सैर करवायी जाएचिंटू ने फाटक से 
किसान ऑरेंज स्क्वॉश की ख़ाली बोतल हमें थमा दी सब चाहते थे की हवाई को 
इसी से लॉंच किया जाए

फिर क्या था ये महान कार्य करने के लिए मुझे चुना गयामैं यही चाहता ही था 
पर इतना उतावला हूँ सबके सामने नहीं दिखा सकता थासमतल ज़मीन पर 
लॉंच पैड रख उसने हवाई को सावधानी से खड़ा कर दियाबबलू ने फूलझड़ी 
ला कर दी और जैसे ही फूलझडी की चिंगरियों ने बॉटल में रखी हवाई को छुआ 
कुछ चिंगारी छिटकी, कुछ सितारे से गिरे और ये क्या??

हवाई आसमान की और ना जा कर कहीं और ही चल दी

बूझिए तो कहाँ 

सीधा जा कर अटैक किया मन्नू के मामा पगड़ी परउधर मामाजी शॉकएडइधरहमउन्होंने अपनी पगड़ी उतारी और हवाई की जर्नी का दी एंड कर दियाउसके बाद आयी हम सब की बारीपिताजी ने ऐसी सुताई की उसकी आवाज़ चार 
गली दूर भी सुनाई दी होगीहवाई के बदले रुख़ ने हमारी एंटर्टेन्मेंट का रुख़ ही 
बदल दिया...



Wednesday, March 24, 2021

हर घर कुछ कहता है

हमारा घर कुछ अलग सा था, बहुत कुछ कहता और सुनता था- कुछ कहीं- अनकही बातें, क़िस्से और कहानियाँ, ढेर सी शिकायतें, प्यार- मोहब्बत से भरे अल्फ़ाज़ और बहुत कुछ जाना-अनजान सा.
ये मकान दादाजी के पिताजी ने बनवाया था- जानते हैं कितना बड़ा है ये! बिट्टू चाचा की शादी में खूब सारे मेहमान आए थे और सब के सब यहीं रहे थे- कितना मज़ा किया था सबने मिलकर. सुना है ये बहुत पुराना है, दादाजी के दादाजी जितना पुराना- तो फिर हुआ ना अंग्रेजों के टाइम का! गली में सबसे बड़ा तिमंज़िला मकान था ये, आजू-बाजू और बहुत से मकान थे पर इसके जितना बड़ा कोई भी नहीं था. गली के नुक्कड़ से ही हमारा हलके पीले-सफ़ेद रंग की सफ़ेदी और मटमैले नीले रंग के दरवाज़ों वाला मकान नज़र आ जाता था.
पंसारी की दुकान पर माँ के समान की लिस्ट जैसे ही पकड़ाते तो झट से वो हमें पहचान लेता. “ पीले-सफ़ेद रंग के बड़े मकान वाले डॉक्टर साहब के पोते हो ना? अभी कुछ देर में लड़के के हाथ समान भिजवाता हूँ.” कमाल है, पंसारी की याददाश्त की- मकान के रंगो से मुझे पहचान लिया! धोबी के पास इस्त्री के लिए कपड़े देने जाते तो वो एकदम देखते ही बोलता, “ मटमैले नीले दरवाज़े वाले मकान में रहते हो ना!डॉक्टर साहब को मेरी राम-राम बोलना.” वो तो मैं बोल दूँगा पर लगता है कि हमारे घर की सफ़ेदी और दरवाज़ों का पेंट पूरी गली में वर्ल्ड फ़ेमस है!


हमारे घर के आँगन में लम्बी-लम्बी क्यारियों में अनार और अमरूद का पेड़ लगे  थे जिन पर पर सुबह से लेकर शाम तक ढेरों चिड़ियों की रौनक़ लगी रहती थी. अक्सर उन पर तोते, बुलबुल और मैना का भी आना-जाना लगा रहता, पूरे दिन पक्षियों का मेला सा लगा रहता. पेड़ों के साथ वाली छोटी क्यारियों में माँ ने तरह-तरह की सब्ज़ियाँ लगा रखी थी. “ आँगन से मुझे टमाटर तोड़ कर ला दे. देख ध्यान से तोड़ना, ज़ोर से खींच कर पूरा पौधा मत हिला देना.” ओके माँ! यह बोल कर मैं झट से भाग जाता आँगन में और जानते हैं कितना मज़ा आता लाल टमाटरों को तोड़ने में! वही साथ में हरी मिर्च के पौधे और लौकी की बेल थी- जिस में खूब बड़ी-बड़ी लौकी आती थी और अक्सर हमारे साथ-साथ पड़ोसियों के घर भी रवाना की जाती.

सब्ज़ियों की क्यारियों के पास गुलाब, चम्पा, चमेली,गुलदाऊदी के फूल वाले पौधे लगे थे- आँगन भीनी-भीनी ख़ुशबू से महकता रहता था. गर्मियों में पेड़-पौधों को पानी देने के बाद पूरे आँगन को ठंडा करने के लिए पानी से धोया जाता तो चारों तरफ़ कितनी प्यारी महक फैल जाती. बारिश के दिनों में छोटे-छोटे घोंघे, मिट्टी को ऊपर-नीचे करते हुए केंचुए,हरी टिड्डियों, रंग-बिरंगी तितलियों को देखने में हमरा सारा समय बीत जाता. हम अपने इस बड़े घर में हर मौसम का ख़ूब मज़ा लेते- चाहे गरमी हो या सर्दी, हमारे लिए हर दिन ख़ूब मज़े का होता था.

आँगन से सटे बरामदे में झूला लगा हुआ था- ये हम सब का फ़ेवरेट था. झूले पर बैठ कर हम पूरे आँगन का नज़ारा लेते और हवा के संग खूब बातें करते, ऐसा जान पड़ता था मानो हम कहीं सैर पर निकले हुए हैं. बरामदे में चार बड़े-बड़े रोशनदान थे जिसने मियाँ कबूतर अपने परिवार के साथ रहते और जो दादी को बिल्कुल भी पसंद नहीं थे. “दादी ये तो मुफ़्त का किरायेदार है, ये ना किराया देगा !” अब दादी से ऐसा कहने का मन होता पर हिम्मत नहीं.

रोशनदान के ठीक नीचे लगी थी नीले कपड़े की लाइनिंग वाली चिक- जिनका रंग नीले से मटमैला हो गया था. गर्मियाँ शुरू होते ही दोपहर से पहले चिकों को नीचे कर दिया जाता ताकि कमरे और दालान ठंडा रह सके. कितना अच्छा  लगता था- जब बाहर आँगन धूप से तप रहा होता तब बरामदे में लगा लाल कोटा पत्थर का फ़र्श ठंडा रहता. चिकों से छन कर आती हुई हल्की-हल्की सूरज की रोशनी से पूरा बरामदा सुंदर, सुनहरा हो जाता था. हम चटाई पर औंधे पड़े सूरज की रोशनी को अपने हाथों में पकड़ने की कोशिश करते और जब नहीं पकड़ पाते तो चटाई से निकली तीलियों को खींच कर उनसे ही खेलने लग जाते. तभी दादी की कर्णभेदी आवाज़ आती, “ नासपीटों, सारी चटाई ख़राब कर डाली, हर समय कुछ ना कुछ बदमाशी करते रहते हो.” दादी के डर से तीलियाँ वहीं फेंक हम अंदर कमरे में आ चुपचाप खेलने लगते. अब दादी से पंगे, नो वे!

बरामदे के साथ सटे हुए हर कमरे की अलग सी कहानी थी, कुछ बातें वहाँ रखा समान करता तो कुछ अफ़साने सुनती पुताई करीं हुई दीवारें. हमारे लिए तो जैसे सारा जहान इस घर में ही सिमट आया था! आँगन से लेकर छत तक, नीचे के कमरों से लेकर ऊपर के कमरों तक हर जगह सिर्फ़ हमारा राज  था- कभी दादी की डाँट,कभी दादाजी का प्यार, कभी माँ का दुलार, कभी बन्नो बुआ से नौक-झोंक, कभी पिताजी की फटकार और ना जाने कितने रंग़ो से निखरा और संवरा हुआ तो गली के नुक्कड़ वाला ये तीनमंज़िला मकान!


हर घर कुछ कहता भी है, सुनता भी है और समझता भी है- आपस का प्यार, शिकवे-शिकायतें और बहुत कुछ जो कभी कहा नहीं और कभी सुना नहीं...

क्या आपका घर भी कुछ कहता है?




Friday, March 19, 2021

स्टोर की स्टोरी

गर्मियों शुरू होने के कुछ हफ़्ते पहले से ही हमारे घर का कुछ अलग ही नज़ारा होता था- हर कोई बस बिज़ी दिखाई पड़ता था.जिस स्टोर की तरफ़ कोई देखता तक नहीं था- उधर सब का आना- जाना लगा रहता. कुछ सामान रखा जाता, कुछ निकाला जाता और ना जाने क्यों इन सब में हमारी दिलचस्पी कुछ ज़्यादा ही रहती. स्कूल से आकर झटपट कपड़े बदल, खाना खा कर हम सब स्टोर के दरवाज़े पर लटक लेते- क्या मालूम कौन सी इंट्रेस्टिंग चीज़ मिल जाए! हम सब को स्टोर रूम में अकेले जाते हुए बहुत ड़र लगता था- कुछ ना कुछ कर के हम उधर का काम टाल देते थे. कभी मजबूरी आन पड़ती तो भैया हम सब इकट्ठे ही जाते. अब किसी ने सही तो कहा है की एकता में ही बल है. ना, ना ग़लत समझे आप! मैं बाजू वाले घर की एकता की बात नहीं कर रहा हूँ- वो तो बहुत कमज़ोर सी है, मैं हम सब के साथ होने की बात कर रहा हूँ.
स्टोर रूम में अकेले जाने की हिम्मत नहीं होती थी- ऐसा नहीं था वहाँ कोई भूत-चुड़ैल रहते हैं पर अंदर का माहौल कुछ डरावना सा लगता था. बिजली की खपत कम हो इसलिए अंदर एक मरियल- सा, अपने जीवन से दुखी पीला बल्ब इतने बड़े स्टोर को रोशनी देने की कोशिश में दिन-रात लगा रहतावहीं स्विच के पास बने हुए आलों में भिन्न- भिन्न तरह की चीजें रखी रहती- जैम और रूहफ़जा की ख़ाली बोतलें, छोटे टिन के डिब्बे, रस्सियों के गोले, कुछ टूटी-फूटी मकड़ियों के जाले से सजी हुई चीज़ें. हमारी कोशिश ये रहती की कुछ भी हो जाए पर हम अपने हाथ को गलती से भी उन आलों तक ना पहुँचने देंगे. इसलिए बड़ी सावधानी से हम बत्ती जलाते और स्टोर का अच्छी तरह से अवलोकन करते, अब जाँच- पड़ताल करने में क्या बुराई है!
ये तो स्टोर की एक तरफ़ की कहानी है, दूसरी तरफ़ पर तो पूरी फ़िल्म ही बन सकती है! उधर पुराने रद्दी अख़बारों और पत्रिकाओं का ढेर लगा रहता जो कबाड़ी वाले के इंतज़ार में दिन प्रतिदिन “कम्प्लेन चाइल्ड” से ग्रो कर रहा होता. हमें ये कहने को मन करता की अरे भई, कहीं ये ढेर बच्चे से सीधा बड़ा ना हो जाए- कृपया कबाड़ीवाले को बुला के इसे गुड्बाई कर दीजिए!
पर ये बात मन में ही रह जाती.
चलिए, अब आगे चलते हैं. कोई दस कदम आगे और तीन लम्बे -लम्बे आले जिन में हमारी पुरानी किताबों और कापियों का संग्रह होता! हम तो पास हो गए पर ये सब कब यहाँ से पास होंगी इसका जवाब सिर्फ़ दादी के पास ही होता.

“ इतनी क्या जल्दी है ये किताबें निकालने की! किसी के काम आ जाएँगी.”

इक्स्क्यूज़ मी दादी लगता है हमारे बच्चों के काम आएँगी! ये शब्द सिर्फ़ दिल में रह जाते पर डर के मारे ज़ुबान पर ना आ पाते.
इन आलों को आधा ढक रखा होता माँ के बड़े से लोहे के संदूक ने जो उनके संग शादी में आया था.ये संदूक कोई ख़ज़ाने से कम नहीं था- कितनी सुंदर चीजें होती थी जिनके दर्शन करना काफ़ी कठिन था.ये बेचारा संदूक पूरे साल दुनिया का तो नहीं पर गद्दों और दरियों का बोझ ज़रूर ढोता और सर्दियों में रज़ाइयों और मोटे-मोटे कम्बल को भी लाद दिया जाता इस मासूम पे!

बरसात में कभी-कभी जब यहाँ पानी टपकता तो पोस्ट्मन के ख़ाली कनस्तर रख दिया जाते और गर्मियाँ शुरू होते ही छत की मरम्मत भी की जाती.


दीन-हीन से स्टोर का सफ़ाई अभियान साल में सिर्फ़ दो चार बारी ही होता और इस में रखी कुछ चीजें तो एक ही सीज़न में ताजी हवा में साँस ले पाती.
उस लिस्ट में सबसे पहले नाम आता महीनों से धूल-धूसरित,मकड़ियों के जालों से सजा जंग लगे दरवाज़ों वाला नीले पैंट किया हुआ कूलर का! जब ये मटमैले रंग का कूलर हमारे घर आया था तो इसकी शान कुछ अलग ही थी- हर इतवार को इसका पानी निकाला जाता और अच्छे से सफ़ाई की जाती. इसकी तीन तरफ़ लगी हुई खस की पट्टियों वाले दरवाज़ों को धूप में रखा जाता, गीले कपड़े से सब साफ़ कर उसे फिर बरामदे में लगी खिड़की में फ़िक्स किया जाता. कहीं से भी गर्म हवा अंदर ना आ सके तो आस पास के गैप में पुराने अख़बार घुसा  दिए जाते. अब इतने बड़े कमरे को ठंडा करने का बोझ इस कूलर के नाज़ुक कंधों पर ही था!


जैसे ही पिताजी बटन ऑन करते हम सारे ठंडी हवा का आनंद लेने के लिए कूलर के सामने खड़े हो जाते. कितनी भीनी-भीनी ख़ुशबू आती, मन करता बस वहीं खड़े रहें. इतने में दादी के प्रवचन शुरू हो जाता “कमबख़्तों, सामने से हटो. मुँह घुस लिया कूलर में. बीमार पड़ जाओगे. आराम से चटाई पर बैठ कर खेलो!”
इस कूलर ने ना जाने कितनी गर्मियाँ हमारे साथ बितायीं-जब बिल्कुल ही साथ ना दे पाया तो स्टोर के एक कोने में रद्दी सामान के साथी बन गया.
अब तो सारे घर में ऐर- कंडिशनर ही है पर इसकी हवा में वो खस और केवड़े की भीनी सुगंध नहीं जो हमें हमारे बचपन के उन बेफ़िक्र, निश्चिंत दिनों में फिर से ले जाए.

Friday, March 5, 2021

दास्तान -ए- गोबर

हमारी हरकतों से सारा घर परेशान था- कभी कोई बदमाशी, तो कभी कोई! हमने सब की नाक में दम कर रखा था. कुसुम चाची के ऊन के गोलों की हम रंग- बिरंगी झालर बन कर अपने कमरे में लटका लेते, तो चाची माँ से शिकायत करती, “ क़सम से जीजी, ये बच्चे एक दिन बहुत पिटने वाले हैं- कमबख़्त ना जाने कब में ऊन उठा कर भाग जाते हैं पता ही नहीं चलता है. इनका स्वेटर पूरा ही नहीं कर पा रही हूँ.” और जैसे ही माँ हमारे कमरे की तरफ़ जैसे ही बढ़ती वैसे ही हम पीछे से जा कर उनसे ख़ूब ज़ोर से लिपट जाते और उन्हें ढेर सारा प्यार करते.
 “अब छोड़ो भी, बदमाशियाँ करते हो और फिर चाहते हो की मैं तुम्हें कुछ ना कहूँ. जाओ चाची से माफ़ी माँगो और उन्हें ऊन वापस क़रो. शायद मेरे पास पुरानी ऊन रखी है तुम्हें खेलने के लिए दे देती  हूँ .”

सबसे ज़्यादा मज़ा आता था हमें बन्नो बुआ के कमरे में! जैसे ही बुआ दाँये- बाँए होती, हम घुस जाते उनके कमरे में और वहाँ रखे सामान का निरीक्षण- परीक्षण शुरू कर देते. मुझे बुआ की श्रिंगार मेज़ पर रखी रंग- बिरंगी बॉटल बहुत सुंदर लगती थी. उन छोटी-बड़ी काँच की बोत्तलों में से कितनी भीनी- भीनी ख़ुशबू आती थी, झट से ढक्कन हटा हम खुद को फुआरों से भिगो देते थे. “ कमबख़्तों, सब सत्यानाश कर दिया! मेरी इम्पोर्टेड पर्फ़्यूम का तो ख़त्म ही कर दी! आज आने दो भैया को तुम्हारी मरम्मत करवाऊँगी!” बुआ की डाँट से बचते- बचाते हम भाग जाते गली में अपने दोस्त मंडली के पास खेलने और मस्ती करने के लिए. 

साहब! बुआ की डाँट से नहीं, पर पिताजी की कुटाई से हमें बहुत डर लगता था...

वहाँ जा के हम अपनी ख़ुराफ़ातों के क़िस्से शेयर करते और खूब हँसते- हम सब एक से बढ़कर एक थे! ऐसी- ऐसी बदमाशी करते के हमें खुद समझ नहीं आता था की हमारे अंदर इतनी क्रीएटिविटी आयी तो आयी कहाँ से! 


एक क़िस्सा तो मैं आपको ज़रूर सुनाना चाहूँगा- हुआ ऐसा की माँ के बम्बई वाले मामाजी हमारे यहाँ आए, वो नानाजी हमें कुछ ख़ास पसंद नहीं थे क्योंकि वो खूब सारा खाना खाते और फिर पूरे घर में पाद मार- मार के गंदी बदबू फैलाते और सारा वातावरण दूषित कर देतेजैसे ही कोई उन्हें टोकता झट से मुकर जाते, “ भई, मेरा पेट तो बिल्कुल सही है, तुम्हारा ही ख़राब होगा. तुम ही बाज़ार में अंट- शंट खाते हो और बदबू फैलाते हो.”


एक तो चोरी और ऊपर से सीनाजोरी !


हम सब ने सोच लिया था की नानाजी को बदबू का जवाब बदबू से ही देंगे.
हमारी गली के नुक्कड़ के पास बिल्ले चाचा का घर था और उन्होंने गाय- भैंस पाली हुईं थी. आसपास की गलियों में रहने उनके यहाँ से ताज़ा दूध लिया करते थे
अब जिधर गाय- भैंस उधर फ़्रेश गोबर भी!

हम चुपके से चाचा की डेयरी के पास गए जहाँ उनकी गाय- भैंस बंधी हुई थीं और नाक बंद और साँस रोक झट से ताज़ा गोबर प्लास्टिक की थैली में भर लिया. जैसे तैसे कर उसे घर में ला कर आँगन में लगे अनार के पेड़ के पीछे छिपा दिया ताकि किसी की नज़र उस पर ना पड़े वरना लेने के देने पड़ जाएँगेउस दिन ना जाने कितनी बार लाल वाली साबुन से हाथ रगड़-रगड़ कर धो डाले!

नानाजी ठूँस-ठूँस कर खाना खा कर सैर पर जाने की आदत थी. अब इतना ठूसेंगे तो वॉक पर जाना भी पड़ेगा ! हमारे पास यही एक मौक़ा था अपने काम को अंजाम देने का.धड़कते दिल से हम सबकी नज़रें बचाते हुए चुपके से उनके कमरे में घुस गए और परदे के पीछे से दुश्मन के इलाक़े का जायज़ा लिया। जैसे ही ऑल ओके का इशारा मिला वैसे ही चुन्नू नाक बंद कर गोबर से भरी प्लास्टिक की थैली ले आया.ये सब करना कोई आसान काम नहीं था- बंटू संतरी बन दरवाज़े पर तैनात था, बन्नू खिड़की से लगातार सब पर नज़र रखे हुए था और मन्नू और मैं इस काम को करने वाले थे- आख़िर टीम मैनज्मेंट भी तो कुछ होती है। हमने धीरे से ट्रंक खोल उसमें  गोबर की थैली रखकर बंद कर दिया। काम हो जाने के बाद हम सारे वहाँ से नौ दो ग्यारह हो गए.

आप सोच रहें होंगे क्या हमें यह सब करते हुए डर नहीं लगा? शायद लगा होगा पर जब ओखली में सिर दिया तो मूसलों से क्या डरना!


इतने में नानाजी की आवाज़ आयी, “ सुनिता, देख तो ज़रा ना जाने कौन कमबख़्त ये गोबर का थैला मेरे ट्रंक में रख ! सारे कपड़ों का सत्यनास कर दिया! इतनी गंदी बदबू आ रही कपड़ों से, अब सारे कपड़े कल धुलवाने पड़ेंगे. ज़रूर इन बच्चों ने ही ये बदमाशी की है- हाथ आने मेरे ख़ूब कूटूँगा इनको! 

जैसे ही सब हमारे कमरे में आए हम ने आँख-भींच मुँह-ढक लिया और सोने का ड्रामा चालू कर दिया ताकि हम शक की रडार पर ना आएँ - नींद तो एक बहाना थी हम तो असली पिक्चर शुरू होने का इंतज़ार कर रहे थे.  मुझे नहीं लगता इन बच्चों ने कुछ किया होगा, ये तो आज बहुत जल्दी सो गए थे. कल सुबह पता करते हैं की किसने किया था. कल मंगला आएगी उससे पूछूँगी, मैंने तो आपके इस्त्री किए हुए कपड़े रखने को कहा था ! 

ये कह कर माँ सब को हमारे कमरे से बाहर ले गयी

सुबह- सुबह जब हम उठे तो मालूम हुआ की नानाजी तारा मौसी के घर चले गए हैं और अब वहीं रहेंगे - हम तो ख़ुशी के मारे झूम उठेइतने में माँ अंदर आयी और बोली,  मैं सब जानती हूँ की तुमने कल क्या किया है, इस बार तो बचा लिया आगे से कोई इस तरह की हरकत मत करना वरना मुझ से बुरा कोई ना होगा!   

हम जानते हैं माँ की आप कभी भी हमारे लिए बुरी नहीं हो सकती क्योंकि माँ तो माँ होती है- बच्चे चाहे कितनी भी ग़लतियाँ करे वो तो हर मुसीबत के सामने ढाल बन कर खड़ी हो जाती है। शायद किसी ने सच ही कहा है, “ क्योंकि भगवान हर किसी के साथ नहीं हो सकते हैं इसलिए उन्होंने माँ की रचना की है !  

Saturday, February 20, 2021

बिजली का जाना

गर्मियों में जब बिजली चली जाती उस दिन तो मानो गली में रौनक़ ही लग जाती- बच्चे अपने स्कूल का काम छोड़ कर खेलने आ जाते, घर के बड़े- बूढ़े घर के बाहर चारपाई पर बैठ इधर उधर की बातों में लग जाते, पिताजी और उनके दोस्त आँगन में बैठ देश की राजनीति पर चर्चा करते और माँ और उनकी सहेलियाँ मोमबत्ती की रोशनी में फटाफट रोटी सेंक रही होतीं ताकि वे सब भी आपस में गपशप कर सके.
अब बिजली जाने का तो पता चल जाता पर बिजली देवी कब आएँगी यह तो सिर्फ़ विद्युत विभाग ही जानता- भले कितने ही फ़ोन लगा लो, वहाँ से सिर्फ़ यही उत्तर मिलता, “ पीछे के ट्रैन्स्फ़ॉर्मर में कुछ ख़राबी है, कितनी देर तक ठीक होगा मालूम नहीं. धन्यवाद.”

बिजली के जाने सबसे ज़्यादा ख़ुशी हम बच्चों को होती- होम्वर्क से छुट्टी मिल जाती और बाहर खेलने के लिए मौक़ा. अब मौक़े पर चौका लगाना तो हमें बखूबी आता, जानबूझ कर वहीं बड़ों के इर्द - गिर्द चक्कर लगाते रहते, वहीं धमा चौकड़ी करते. जिससे हार थक कर वे हमें अपने पास बुला पैसे देते और बोलते,” ये लो पैसे और बनवारी की दुकान से आइसक्रीम ले आओ.” हम को भी तो इसी मौक़े की तलाश रहती- झटपट पैसे पकड़ सारी वानर सेना बनवारी की दुकान की तरफ़ लपकती. 

बिजली जाने से सबसे ज़्यादा फ़ायदा बनवारी का होता था- मोहल्ले के सारे बच्चे उसकी दुकान पर आइसक्रीम और ठंडी-ठंडी कोका कोला लेने के लिए मक्खियों के जैसे मंडराते. दुकान के बाहर बेंच पर बैठ हम मज़े से आइसक्रीम चूसते और एक भी बूँद टपकने ना देते चाहे कुछ भी हो जाए. आइसक्रीम खाने के बाद इंस्टंट एनर्जी आ जाती और फिर हम सारे घर की ओर दौड़ लगाते- चारपाइयाँ लांघते हुए, गली के बीच में ऊँघते हुए कुत्तों को टापते हुए, बंटू के छोटे भाई की तिपहिया के ऊपर से कूदते हुए और बन्नू की बुआ की डाँट खाते हुए सीधे पहुँचते घर के आँगन में जहां सब  बैठे होते.

और फिर शुगर स्पाइक के बाद शुरू करते अपनी बदमाशियाँ, कभी इधर चढ़ - कभी उधर, कभी माँ के पीछे छिप जाना और कभी बन्नो बुआ को तंग करना, पुरानी कॉपी के पन्ने फाड़ हवाईजहाज़ बना और हाथ में पकड़ पूरे बरामदे और आँगन के चक्कर काटना.पिताजी की झाड़ खा कर मोमबत्ती की लौ पर मंडराते हुए कीट-पतंगों को देखना, बड़ों की आँख बचा अपनी उँगलियों से पीली-नारंगी गरम लौ को पकड़ने की कोशिश करना, काग़ज़ के लम्बे -लम्बे रिबन बना उन्हें मोमबत्ती पर लटका के जलाना और फिर उसके काले, जले अवशेषों को फूँक मार उड़ाना- ज़िंदगी बहुत ही सीधी और सरल थी. 
जैसे ही थक जाते आँगन में बिछी चारपाई पर आकार लेट जाते और आसमान में बिखरे अनगिनत तारों को तब तक गिनते रहते जब तक आँखों के दरवाज़े पर नींद की दस्तक ना हो जाये. 
बिजली के आने ना आने का कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, चाँद-तारे देखते-देखते ही रात निकल जाती इतनी. 
इतनी सुकून की नींद सोते थे हम!

आज ऐयर कंडिशनर की ठंडी हवा में सोते ज़रूर हैं पर ना आँखों में नींद है और ना दिल में सुकून,सिर्फ़ दिमाग़ पर ढेरों परेशनियाँ और अकेलेपन के सन्नाटे का बोझ...






Tuesday, February 16, 2021

बूढ़ी बेबे

गली के कोने में बूढ़ी बेबे का मकान हुआ करता था - समझ में नहीं आता की कौन ज़्यादा बूढ़ा है- बेबे या मकान! दोनों ही कमाल के स्ट्रोंग थे- कितनी भी ज़ोर से बारिश आए, सख़्त गर्मी पड़े, कंपकंपा देने वाली ठंड आए या ज़ोरदार धूल भरी आंधियाँ चले मजाल है की उनके मिज़ाज में कुछ ऊनीस-बीस का भी फ़र्क़ आए.बेबे की ज़ुबान की तल्ख़ी और मकान की बेरंग होती हुई जानदार दीवारें सब पर बहुत भारी पड़ती थी.


हमें लगता था बेबे अकेले रहती थी- फिर पता चल की उनके शौहर ऑटो रिक्शॉ चलाते हैं और बिल्कुल निरीह गाय समान हैं- बीवी के सामने चूँ भी नहीं करते या फिर शायद उनको मौक़ा ही नहीं मिलता. सारे दिन दिल्ली की सड़कों पर ऑटो चलाते और देर रात शराब पीकर आते. खाना के साथ बेबे की खूब सारी गालियाँ खा के शहतूत के पेड़ के नीचे अपनी चारपाई लगा कर सो जाते हैं. शायद बेबे की कड़वी ज़बान के गोलियों से बचने के लिए पीते थे- होश में रहते तो फिर रोज़ घर में पानीपत का युद्ध होता और पूरा मोहल्ला दर्शक!
ग़ज़ब की हिम्मत थी बेबे में- सब कुछ उनके कंट्रोल में था! घर, पति, बच्चे, दूर- पास के रिश्तेदार और हमारा गली- मोहल्ला भी. उनके दो बेटे पर कोई उनके साथ नहीं रहता था -  इतनी गालियों और डाँट झेलने के लिए बहुत बड़ा दिल भी तो चाहिए.उनके लड़के २-४ महीने में कभी एक बार अपने माँ- बाप से मिलने आते थे.

लेकिन उनके साथ उनकी पोती बबली रहती थी- बेबे उसे बेहद प्यार करती थी. उसके लिए मोहल्ले वालों से झगड़ना उनका रोज़ का काम था.मज़ेदार बात तो यह है बबली बिल्कुल अपनी दादी हूबहू ज़ीरॉक्स थी- एक नम्बर की  लड़ाकी, झगड़ालू और चिलम्मचिल्ली करने वाली- शायद यही कारण था की गली में रहने वाला कोई भी बच्चा उसके साथ खेलना नहीं चाहता था. साथ ना खेलो तो मुसीबत, खेलो तो मुसीबत- हम सबकी नाक में दम कर रखा था बेबे और बबली ने. अगर हम खेलना शुरू कर देते तो वो अपनी दादी के साथ बिन मौसम की बरसात के जैसे टपक पड़ती और फिर बेबे हमें पंजाबी गलियों से नवाज़ती! दिल पर पत्थर रख उसे टीम में शामिल कर मजबूरन खेल खतम होने तक झेलना पड़ता क्योंकि बेबे गिद्ध की तरह हम पर आँखें गड़ायें बैठी होती. 

भले ही बेबे बहुत कड़े स्वभाव वाली थी पर दिल की बहुत अच्छी थी. बिल्कुल अखरोट जैसी- ऊपर से सख़्त और अंदर से नरम! जैसे ही पेड़ मीठे लाल- हरे शहतूतों से भर जाता, अपनी चारपाई पर बाहर बैठी सब बच्चों को आवाज़ लगती, “ स्कूल से आने के बाद तुम सब शहतूत तोड़ कर ले जाना- बहुत मीठे हैं और थोड़ा-थोड़ा हलवा भी खा कर जाना, तुम सब के लिये बना कर रखूँगी.” हमें कभी भी उनका यह सर्द-कभी गर्म हवा का रुख़ समझ में नहीं आया.

धीरे-धीरे वक्त गुजरता रहा, फिर गली से ज़्यादा समय कमरे में पढ़ाई करते हुए बीतने लगा. जब कभी बेबे दिख जाती तो उन्हें नमस्ते कर निकलते तो बदले में खूब सारा आशीर्वाद मिल जाता. स्कूल से कॉलेज, कॉलेज से नौकरी और वो भी दिल्ली के बाहर- फिर उस गली से नाता ही छूट गया जब पिताजी का ट्रान्स्फ़र मुंबई हो गया. कुछ साल मुंबई में बीतने के बाद माँ और पिताजी भी मेरे पास अमेरिका आ गया- फिर तो जैसे अपनों से क्या देश से भी बहुत दूर हो गया.

बचपन की यादें और बातें सिर्फ़ एक क़िस्सा बन कर रह गयीं- कभी कोई पुराना यार-दोस्त फ़ोन करता तो ऐसा लगता मानो समय रुक गया है और हम फिर से बच्चे बन गए हैं. बातों में वो ही बचपन की मस्ती, शरारत और बदमाशियों का लज़ीज़ फ़्लेवर फिर से बेस्वाद लाइफ़ को टेस्टी बना देता. 
कभी- कभी मन में आता की एक बार जा कर देखूँ वो गली, घर का आँगन और पुराने दोस्त कैसे हैं जिन के साथ बचपन के ख़ूबसूरत पल बितायें हैं और फिर एक दिन मुझे वो अवसर मिल ही गयाकम्पनी के एक प्रोजेक्ट के लिए मुझे दिल्ली भेजा गया और शायद यही एक मौक़ा था मेरे पास पुरानी यादों को फिर से ताज़ा करने का.
मैंने बिट्टू को फ़ोन किया और कहा, “ क्या हम पुराने घर जा सकते हैं, बहुत बरस हो गए देखे हुए.” बिट्टू मेरा सबसे ख़ास दोस्त है और जगह की दूरी से हमारी दोस्ती में कोई फ़र्क़ नहीं आया है. आज भी हम एक दूसरे के जिगरी हैं!
बिट्टू ने मुझे होटेल से पिक किया और बाइक पर बैठा के ले आया यादों की गालियों में - जहां बचपन आज भी खूब शरारतें करता है, खट्टी- मिट्ठी नौंक- झौंक धूप सेंकती है, आशीर्वाद और तजुर्बे की गरमाहट से भरे हाथ आज भी सिर सहलाते थकते नहीं है और प्यार के मर्तबानों को सम्भाल कर रखा जाता है. 

इन सब की बीच में मुझे से सबसे ज़्यादा कमी खली तो वो थी सफ़ेद चुन्नी ओढ़े और मुँह में गालियाँ और दिल में ढेर सा प्यार रख़ने वाली बेबे की! सब कुछ शायद वैसा ही था पर बेबे नहीं दिखी.
भारी मन से यादों की गली से निकल तो गया पर जब पलट कर देखा तो ऐसा लगा की शहतूतों से लदा पेड़ मकान में मानो बेबे बन मुट्ठी भर-भर कर प्यार की मिठास दे रहा हो.

मैगज़ीन की मेहरबानी

आज क्लास में कुछ ज़्यादा ही शोर-शराबा हो रहा था, ऐसा जान पड़ता था की हम मच्छी बाज़ार में खड़े हैं. हर तरफ़ से चिल्ल- पों ही सुनाई पड़ रही थी...