Saturday, September 14, 2019

बॉटल में बदमाशी

हमारी बदमाशियों से दादी परेशान रहती थी और उनकी हिदायतों से हम, ऐसा जान पड़ता था की हम दोनो में कोई ताल -मेल ही नहीं है। हमें आए दिन कोई ना कोई नयी शरारत सूझती ही रहती थी जिससे दादी का ब्लड प्रेशर आउट ऑफ़ कंट्रोल हो जाता था। " कमबख़्त, सारे दिन ऊधम करते रहते है, ज़रा देर सुकून नहीं लेने देते। कभी इधर छेड़खानी तो कभी उधर, निचला बैठना तो आता ही नहीं है।" हमने सब की नाक में दम कर रखा था, अब क्या करे जनाब बदमाशी तो हमारी रग- रग में भरी हुई थी, इतनी आसानी से कैसे छोड़ देते।कुछ घर आए मेहमानों से तो हमारा छत्तीस का आँकड़ा था- ना वो हमें भाते थे और ना हम उन्हें। फिर क्या, जब वो अनचाहे मेहमान घर आते तो हमारा दिमाग़ नयी-नयी शैतानियाँ सोचने पर मजबूर हो जाता। अब कुछ ऐसा तब हुआ जब माँ के बम्बई वाले मामाजी हमारे घर पधारे! उनके साथ हमें एक नहीं बहुत सारी प्राब्लम्ज़ थी।एक तो वह बहुत बड़े पेटू थे और फिर ओवर ईटिंग करके गंदी बदबूदार हवा से सारे घर का माहौल ख़राब कर देते थे और नाम लगाते हमारा! "सुनीता, तेरे बच्चे सारे दिन कुछ भी अनाप -शानप खाते रहते हैं जिसे इनका पेट ख़राब हो जाता है, ज़रा ख़याल रखा कर इनके खाने का!" इक्स्क्यूज़ मी!नानाजी पेट हमारा नहीं आपका ख़राब रहता है, आप दिन भर मुँह जो चलाते रहते हैं, पर यह बात सिर्फ़ दिल में ही रहती बाहर ना आ पाती। हमारा हाज़मा बहुत अच्छा था! माँ के मामाजी ना सिर्फ़ ज़्यादा खाते थे, उससे कहीं ज़्यादा बातें भी करते थे और लम्बी- लम्बी छोड़ते भी थे और हम बैठ कर उनकी गप लपेटा करते थे।सब के घर जा कर खाना, बातें करना, गप्पें हाँकना और रिश्ते करवाना उनका फ़ेवरेट पास टाइम था। 
अब एक दिन हुआ यूँ की नानाजी को बहुत जल्दी मची हुई थी, सुबह से सबको परेशान कर रखा था। बेचारा धोबी मुफ़्त में डाँट खा कर घर से कुछ देर पहले ही निकला था और उसके जाते ही बहुत सबों के डाँट खाने के नम्बर लगे हुए थे। हम तो सामने ही नहीं पड़े, वरना लेने के देने पड़ जाते।"अच्छा सुनिता, अब मैं सन्नों के घर जा रहा हूँ, वही दोपहर का खाना भी खाऊँगा और शाम को वापिस लौटूँगा।"यह कह नानाजी ने फटाफट से मेज़ पर रखी बोतल उठाई और मुँह को लगा ली और उसके बाद जो तमाशा हुआ बस पूछिए ही मत! तुरंत ही थू-थू करने लगे और सबको कोसना शुरू कर दिया।" किस कमबख़्त ने ये मरा मिट्टी का तेल* पानी की बोतल में रखा है, अब दूर से पता ही नहीं चला की पानी है या कुछ और अब तो ही उलटी करनी पड़ेगी!" 
यह कह कर वे सीधे वाश बेसिन की तरफ़ भागे और हम सब कमरे के बाहर भागे इससे पहले हम पर कोई इल्ज़ाम लगाता और हम अपनी वकालत भी ना कर पाते।पर जनाब क्या करे, हमारी बदमाशियों का ट्रैक रेकर्ड कुछ ज़्यादा ही ख़राब था। माँ ने टेढ़ी आँखों से हमें देखा पर इस बार तो यह बाज़ी शायद किसी और ने मार ली थी। इस घर में हमारे अलावा भी कोई और है जो नानाजी को कुछ कम पसंद करता है पर कौन यह तो आज तक भी नहीं पता चला !
*( उस ज़माने में मिट्टी का तेल बिलकुल पानी के रंग जैसा होता था, आजकल जैसे नीले रंग का नहीं ) 

बचपन की मिठास

हमारे घर के पास के बहुत बड़ा पीपल का पेड़ था और बग़ल में सुरेश हलवाई की दुकान थी- एक तरफ़ विशालकाय कड़ाई में दूध उबलता रहता और दूसरी तरफ़ वो...