Friday, April 16, 2021

वॉकमैन का वॉक आउट

परसों की ही बात है हमारे मोहल्ले में ऐसा हंगामा मचा की मैं आपको अब क्या बताऊँ! आप जानना चाहेंगे की मोहल्ले में ऐसा क्या बवाल हुआ जिसने उस दिन को अत्यंत हैपनिंग बना दिया ? चलिये, मैं आपको फ़्लैश्बैक में ले चलता हूँ! इतवार का दिन था घर के सारे काम स्लो स्पीड पर हो रहे थे- किसी को भी कोई काम करने की जल्दी नहीं थी. पिताजी सुबह से चार बार चाय पी चुके थे चौथी और टाइम्ज़ ओफ़ इंडिया चाटने में व्यस्त थे, दादी पापड़ और बड़ियाँ सूखा रही थी और साथ- साथ माँ को इन्स्ट्रक्शन भी देर रही थी,” अरी, ज़रा जल्दी-जल्दी हाथ चला, इन पापड़-बड़ियों के साथ आम की फाँके भी सुखानी है. धूप चली जाएगी तो ये सूखेंगी नहीं.” 

बन्नो बुआ अपनी सहेली के साथ फ़िल्म गयी हुई थी और हम लोग चारपाई पर सुस्ता रहे थे-बबलू चंदामामा पढ़ने में बिज़ी था, गोलू चारपाई की रस्सी को खींच-खींच कर निकाल रहा था और मैं- इन सबको को देखते हुए ये सोच रहा था की आज के दिन को मज़ेदार कैसे बनाया जाए.

कुछ तो किया जाए जिससे ये संडे फनडे बन जाए! इतने में शर्मा अंकल ने पिताजी को आवाज़ लगाई, “ क्या बात है भाईसाहब, अकेले -अकेले चाय पी जा रही है, एक कप हमारा भी बनता है.”  पिताजी ने उन्हें देखा और माँ को चाय बनाने के लिए बोला. इतवार के दिन अक्सर पिताजी के दोस्त घर पर चाय पीने के लिए टपक पड़ते थे और फिर दोपहर का खाना खा कर ही विदा होते थे.माँ से ज़्यादा तो हमें ऐसे मुफ़्तख़ोरों से चिड़ थे पर हम कुछ कह नहीं सकते थे. अब आ बैल मुझे मार में हमें बिल्कुल भी दिलचस्पी नहीं थी!अंकल और पिताजी पॉलिटिक्स पर डिस्कशन कर रहे थे और हमारी बोरियत बढ़ती जा रही थी. 

इतने में गली में कुछ शोर सुनाई दिया, हम तीनों लपक कर जाली के दरवाज़े पर लटक गए ताकि हम कोई भी ऐक्शन मिस ना करें. जा कर देखा तो कोई भी ना दिखायी पड़ा, हमें लगा शायद दूसरी तरफ़ से आया होगा तो अपना सा मुँह लेकर बरामदे में लगे झूले की तरफ़ चल दिए. चलो कुछ नहीं तो झूला ही झूल लेते हैं, अब टाइम तो पास करना है.इतने में टप्पू ने ज़ोर से आवाज़ लगायी, “ ओए, जल्दी आ तुझे कुछ  बताना है.” मैंने झट देनी झूले से कूद मारी और पहुँच गया जाली के दरवाज़े पर खड़े टप्पू मियाँ के पास.  “ क्या है? क्यों अपना गला क्यों फाड़ रहा है ?” मैंने  उससे पूछा. इससे पहले कि वो कुछ बताता, पीछे से मिंटू बोल पड़ा, “ देवेन के चाचाजी उसके लिए हॉंगकॉंग से वॉकमैन ले कर आए हैं, जल्दी चलो देख कर आते हैं.” मैंने झट से अपनी बाटा की नीली हवाई चप्पल पहनी और हम सब दौड़े देवेन के घर.


वहाँ का तो नजारा ही अलग था- मेला सा लगा हुआ था! मोहल्ले के सारे बच्चे वही पर जमा थे, एक दूसरे के कंधे पर हाथ रख उचक-उचक कर वॉकमैन की एक झलक पाने के लिए. अबे! ऐसा क्या है जो सब के सब मरे जा रहे हैं देखने के लिए! हमें देखते ही देवेन ने इशारे से हमें आगे आने को कहा- हम सबको चीरते हुए, ना! ना! फिर से आप ग़लत सोचने लगे, हम बच्चों के बीच से निकलते हुए देवेन के पास पहुँचे तो आँखें खुली की खुली रह गयीं. नीले और सिल्वर रंग वाले सोनी वॉकमैन ने तुरंत ही हमें अपनी और आकर्षित कर लिया - इतना छोटा और बेरोकटोक म्यूज़िक का भंडार! हेड्फ़ोन कान में लगाओ और चलते- फिरते, उठते-बैठते, गिरते-पड़ते म्यूज़िक सुनते रहो! कितना मज़ा आता होगा ना.
हमें लगा देवेन हमें उससे गाने सुनने का एक चान्स देगा पर उस ने तो साफ़ इनकार कर दिया.” तुम सब जाओ अब मैं कुछ देर गाने सुनूँगा. शाम को पार्क में मिलते हैं.” हम सब  घर वापिस आ गए पर पूरे रास्ते सिर्फ़ वॉक मैन की बात ही करते रहे. माँ ने खाने के लिए बुलाया तो ये झूठ बोल दिया की हम देवेन के घर से बिस्किट और समोसे खा कर आए हैं. दिमाग़ में तो बस वॉक मैन ही वॉक कर रहा था!


हम लोग कमरे में औंधे पड़े देवेन के बारे में बतिया रहे थे अचानक खूब शोर सुनाई दिया और साथ में पकड़ो- पकड़ो की आवाज़ें! हम फटाफट आँगन की तरफ़ भागे तो देखते क्या हैं की दादी और माँ मनीषा काकी से बातें कर रही है और पिताजी गली के सारे लोगों के साथ खड़े हो कर जसजीत की छत की और ताक रहे हैं.

इतने में क्या देखते हैं की मुन्ना चाचा और उनके कुछ फ़्रेंड्ज़ लम्बी - लम्बी बांस की लाठियाँ ले कर हुर्र-हुर्र की आवाज़ें निकलने लगे. “ ये क्या हो रहा है? मोहल्ले के सारे लोग किस ख़ुशी में यहाँ जमा हैं? और ये मुन्ना चाचा ऐसी आवाज़ें क्यों निकाल रहे हैं?” प्रश्न अनेक पर उत्तर देने के लिए कोई भी इंट्रेस्टेड नहीं! इतने में समर आया और बोला, “ कांड हो गया भाई, कांड! अबे, कहाँ थे तुम लोग? सारी गली के लोग आ गए हल्ला सुन कर तुम तीनों पता नहीं कहाँ दफ़ा थे?” 

इससे पहले मैं कुछ पूछता या समर कुछ बताता दीपक काका ज़ोर से चिल्लाये, “ वो रहा लंगूर देवेन के वॉक मैन के साथ! जल्दी से सुषमा बुआ की छत पर किसी को भेजो उसे पकड़ने के लिए. सुधीर, तू ज़रा जा कर देख वो निकम्मे म्यूनिसिपैलिटी वाले अभी तक आए क्यों नहीं? जल्दी करो, टाइम मत वेस्ट करो.” 

हैं! ये क्या हुआ? जब हम देवेन के घर से लौटे थे तब तक तो सब ठीक था - ये कब हुआ ? लंगूर को गाना सुनने का चस्का कब से लगा?


सामने देखा तो देवेन खड़ा रो रहा था, अब उसे दिलासा देने का तो हमारा फ़र्ज़ बनता था. रोनी सूरत बना कर हम उसके पास पहुँचे तो वो हिचकियाँ लेते बोला, “जानते हो मेरे साथ कितना बुरा हुआ- तुम लोगों के जाने के बाद मैं छत पर जा कर म्यूज़िक सुन रहा था और संतरे खा रहा था. मैंने सोचा धूप में बैठा हूँ तो कुछ कॉमिक्स भी पढ़ने के किए ऊपर ले आता हूँ. अब मुझे क्या पता था की मेरी ये गलती मुझ को बहुत भारी पड़ेगी.” मैं कॉमिक्स ले कर जैसे ही वापिस आया तो क्या देखता हूँ की चारपाई के पास एक लंगूर बैठा जिस के हाथ में मेरा वॉक मैन है और उसकी दूसरी तरफ़ संतरे के छिलके. मैं तो एकदम घबरा गया और डर के मारे मैं ज़ोर से चीखा. लंगूर ने जैसे ही मेरी चीख सुनी, वो चारपाई से कूद कर मेरा वॉक मैन हाथ में ले कर छत की दूसरी ओर लपका. इससे पहले मैं कुछ कर पता वो लम्बी कूद में दो-तीन छतें फ़ांद कर भाग गया.”

अपनी रामायण सुनाने के बाद वो फिर से रोने लग गया. बात तो बहुत सैड थी पर हम लोग थोड़े कमीने टाइप्स थे- मन ही मन खुश हो रहे थे. ले बच्चू, तूने हमें गाने नहीं सुनने दिए ना अब भुगत उसका नतीजा! हमारा श्राप लगा है तेरे वॉक मैन को! कहना को मन तो बहुत कर रहा था पर ये बात हमारे मुँह पर कभी ना आयी. हम ने उसके साथ हमदर्दी जतायी और खड़े हो कर तमाशा देखने लगे. 

“अभी पिक्चर बाक़ी है मेरे दोस्त!” सोनू आकर मेरे कान में फुसफुसाया. मन में आया की उसके कान के नीचे एक बजा डालूँ पर सिचूएशन की डिमांड थी- की मेरे चुप रहने में भलाई है. इसलिए शराफ़त से खड़े हो कर देखने लगे की अब आगे क्या होगा.

तभी सुषमा बुआ की छत पर दो- चार आदमी नज़र आए. शायद, वो आदमी  म्यूनिसिपैलिटी वाले  थे जो लंगूर को पकड़ने आ गए थे. इस से पहले की कोई उससे पकड़ता लंगूर ने पवन पुत्र हनुमान की तरह लंका के उद्यान यानी हमारी गली में उपद्रव मचा दिया. एक छत से दूसरी छत पर धुले कपड़ों को नीचे गिराते हुए, सूखते पापड़ों पर पैर धरते हुए, अचार के मर्तबान लुढ़काते हुए महाशय पीपल के पेड़ की तरफ़ लपके. 

फिर वही हुआ जिसका डर था - इस लपका-लपकी में लंगूर ने वॉक मैन को फ़्लैट मैन बना दिया! पीपल की सबसे ऊँची डाल पर चढ़ कर उसने वॉक मैन को स्विंग कर के ऐसा फेंका की उसको धरती की धूल चटा डाली. किसी को इतना टाइम भी न दिया की कोई उसे पकड़ सके.
देवेन का वॉक मैन वापिस आया ज़रूर पर टुकड़ों में ! 

उसके कितने टुकड़े हुए ये तो मुझे याद नहीं पर देवेन की लापरवाही के लिए जो उसकी धुलाई हुई वो पूछिये ही मत. 

मियाँ लंगूर की मेहरबानी से देवेन की ज़िंदगी से वॉकमैन हमेशा के लिए वॉक आउट कर गया...

Friday, April 2, 2021

मैगज़ीन की मेहरबानी

आज क्लास में कुछ ज़्यादा ही शोर-शराबा हो रहा था, ऐसा जान पड़ता था की हम मच्छी बाज़ार में खड़े हैं. हर तरफ़ से चिल्ल- पों ही सुनाई पड़ रही थी. एक तो बस लेट आयी, ऊपर से कंडक्टर अंकल की डाँट अलग पड़ी और फिर क्लास में घुसते ही ये शोर -  लगता है आज का दिन कुछ अलग ही होगा.
बैग को डेस्क पर रख जैसे ही मैं पीछे मुड़ा,तैसे ही कपिल के आवाज़ आयी, “ ओए, जल्दी आ तेरे कुछ दिखाना है .” ऐसा क्या है जिस के लिए इतना बेसब्रापन हो रहा है, कुछ समझ नहीं आया. मैंने खुद को रिवर्स गेयर में डाला ही था तभी वाइस- प्रिन्सिपल सर ने एंट्री मारी- उन्हें देखते ही सब तरफ़ सन्नाटा छा गया और अचानक से सारी क्लास एकदम सुव्यवस्थित हो गयी. हम सब अपनी सीटों पर संस्कारी, सदाचारी बालकों जैसे जा कर बैठ गए. क्लास मछली बाज़ार से बदल कर कोलाहल रहित ज़ोन में तब्दील हो गयी.


“ वेरी गुड बच्चों! बिल्कुल ऐसे ही समझदार बन आगे के दो पिरीयड्ज़ बिताने हैं. शर्मा मैडम आज नहीं आयीं हैं और उन्हें रिप्लेस करने के लिए कोई दूसरी टीचर नहीं है. इसलिए ये दो तुम्हारे फ़्री पिरीयड हैं- चुपचाप सब लोग सेल्फ़-स्टडी करेंगे .” यह सुनते ही हमारी बाँछे खिल गयी. अंधा क्या माँगे दो आँखें! आज तो यह मुहावरा सही से समझ आ गया. हमारी तो मन की मुराद पूरी हो गयी- हम तो दिल ही दिल में दुआ माँग रहे थे की कोई फ़्री पिरीयड मिल जाए तो देखें की कपिल और उसके ग्रूप के लड़के हमें क्या दिखाने के लिए बुला रहें हैं. सच में भगवान होते हैं और हम जैसे नन्हे-मुन्ने, मासूमों की बात भी सुनते हैं.


वहाँ सर ने एग्ज़िट किया, यहाँ हमारी बदमाशियों ने एंटर! सब अपनी सीटों से उठ कर इधर-उधर बिखर लिए. क्लासरूम जैसे लड़कों और लड़कियों के बीच में बँट गया था- सारी लड़कियाँ और पढ़ाकू बच्चे आगे और हमारे टाइप वाले यानी शरारती, बदमाश और शरीर बच्चों ने पीछे की सीटें सम्भाल ली थी. हमें जिज्ञासा पीछे की और खींच के ले गयी जहां हमारी क्लास के धुरन्धर बैठे हुए थे. नहीं, नहीं जिज्ञासा किसी लड़की का नाम नहीं है! हमें तो हमारी प्रबल इच्छा पीछे खींच रही थी क्योंकि हम वो सब मिस नहीं करना चाह रहे थे जिसे बाक़ी सब देखने वाले थे. “ कुछ तो है बंटी, नहीं तो ये सारे इतने उतावले नहीं होते. शायद वो छिब्बर भी कुछ लाया है, कोई मैगज़ीन मालूम होती है,” मैंने रूपक से कहा.रूपक ने पीछे देख कर इग्नोर कर दिया और झट से बोला, “ तुझे जाना है तो जा, मुझे कोई इंट्रेस्ट नहीं है.”


तभी क्लास मॉनिटर, दीपा ने मुझे अपनी सीट पर वापिस जाने का इशारा किया. उसकी बात मानना तो ज़रूरी था वरना प्रिन्सिपल सर के पास जाने वाली लिस्ट में मेरा नाम भी जुड़ जाता.अपनी सीट पर वापिस आ कर मैंने क्लास पर नज़र डाली, जिसका आँखों देखा हाल मैं आपके साथ शेयर करता हूँ. 

चलिए आगे से शुरू करते हैं- सबसे आगे क्लास के टापर्ज़ बैठ कर डिस्कशन कर रहे थे और एक दूसरे की कठिन सम्ज़ को करने में मदद कर रहे थे. हम तो उनके लेवल तक अपने सपनों के सपनों में भी नहीं पहुँच सकते थे. वो सब तो बिल्कुल अलग ही थे- नो नॉन्सेन्स टाइप्स! इन की वजह से हमें दुनिया, समाज ! ना, ना क्लास और घर में ताने सुनने पड़ते थे. “ निकम्मों, सारा टाइम बर्बाद करते हो. पढ़ाई के नाम पर गोल अंडा! साँवली, धीरज, संजीव को देखो- सौ में सौ लाते हैं. एक तुम! पास हो जाओ तो ग़नीमत है!” मन में आते की कह दें की जान लोगे क्या बच्चे की!  अब सौ की हमारी औक़ात नहीं है. हम तो बहुत सब्रवाले हैं, पचास-साठ में खुश हो जाते हैं. पर बहुत सी बातें दिल में ही रह जाती.


थोड़ा पीछे आते हैं, कुछ है क्लास में पेंटर बाबू जिन्हें यह दो पिरीयड में मौक़ा मिल गया अपने मास्टरपीसेज़ को पूरा करने का- डेस्क पर रंग फैला कर खुद को पिकासो से कम नहीं समझ रहे थे. उनके साथ वाली सीट पर बैठी सपना, रितु और वंदना गप्पें मारने में बिज़ी तो उधर दिव्या लाइब्रेरी बुक में पूरी तरह से घुसी हुई थी. यार, इस क्लास में अजीब-अजीब से नमूने भरे पड़े हैं!आगे बैठने वाले सारे बच्चे बेहद तहज़ीबदार, पढ़ाकू और संस्कारी टाइप्स और पीछे बैठने वाले सब एक से बढ़कर एक!


इतने में दीपा को हिस्ट्री की टीचर ने क्लास के बाहर बुलाया और मेरे पास यही एक मौक़ा था पीछे जाने का. जैसे ही मैं पीछे पहुँचा तो देखा कपिल चारों तरफ़ से क्लास के लफ़ंगो से गिरा हुआ था- सब की नज़रें उसकी हाथ में पकड़ी हुई मैगज़ीन पर ही टिकी हुई थी. सब मज़े ले -ले कर देख रहे थे. मुझे देखते ही कपिल बोला, “ फटफट आ, नहीं तो बहुत कुछ मिस हो जाएगा .”  जैसे ही मेरी निगाह मैगज़ीन के खुले पन्नों पर पड़ी मेरी तो सिट्टी- पिट्टी गुम हो गयी! 

ये क्या! प्लेबॉय! अडल्ट मैगज़ीन! 

“ कहाँ से लाया इसे?” मैंने कपिल से पूछा. “ तुम आम खा, गुठलियाँ क्यों गिनता है?”, उसने मुझे से हंसते हुए कहा.
अचानक से मुझे फ़ील हुआ की मेरे पैरों तले से धरती खिसक रही है, क्लास में सब कुछ घूम रहा है- ख़ुशी और डर का काक्टेल हो गया था. तभी मेरे कंधे पे घूमते हुए उस अदृश्य शरीफ़ फ़रिश्ते ने कहा,  नीटू, ये समय सही नहीं - बेटा चुपचाप निकल ले, वरना लेने के देने पड़ जाएँगे.” मेरे आगे बढ़ते क़दम वही रुक गए और अपने दिल पर पत्थर रख मैं पीछे की तरफ़ पलट लिया. मैं चुपके से वहाँ से निकलकर अपनी सीट पर आ गया और किताब पढ़ने लगा. कपिल ने मुझे इशारा भी किया पर मैंने उसे मना कर दिया. 

सब के सब झुंड बना कर मैगज़ीन देख ही रहे थे इतने में हिंदी पढ़ाने वाले ठाकुर सिर ने एंट्री मारी. “ तुम्हारी कक्षा-संचालक कहाँ है ? और वहाँ पर क्या त्योहार मनाया जा रहा है चलिए बताइए?,” यह कहते-कहते सर कपिल की सीट पर पहुँच गए और बेचारा कपिल उसे तो मौक़ा भी ना मिला मैगज़ीन छिपाने का और खुद को बचाने का!

फिर आगे की दास्तान ना पूछे तो बेहतर होगा. कपिल और उसके साथ-साथ बाक़ी सब लड़कों की जो सुताई हुई उसका विवरण मैं ना दे पाऊँगा, ऐसा जान पड़ता था की बॉलीवुड के ऐक्शन मास्टरों ने हमारे स्कूल की इस धुलाई- सुताई प्रोग्राम से प्रेरित हो कर ही अपने आने वाली फ़िल्मों के ऐक्शन सीन तैयार करे होंगे. आख़िर कोई इन्स्परेशन भी तो होनी चाहिए! 

फिर प्रिन्सिपल रूम के दर्शन और उसके बाद वॉर्निंग लेटर!  

कपिल और उसके दोस्तों ने कभी सोचा भी ना था की उनकी लाइफ़ ही एक ओपन बुक, नहीं मैगज़ीन बन जाएगी, जिसे कोई भी पढ़ने में इंट्रेस्टेड नहीं होगा...

बचपन की मिठास

हमारे घर के पास के बहुत बड़ा पीपल का पेड़ था और बग़ल में सुरेश हलवाई की दुकान थी- एक तरफ़ विशालकाय कड़ाई में दूध उबलता रहता और दूसरी तरफ़ वो...