Friday, March 19, 2021

स्टोर की स्टोरी

गर्मियों शुरू होने के कुछ हफ़्ते पहले से ही हमारे घर का कुछ अलग ही नज़ारा होता था- हर कोई बस बिज़ी दिखाई पड़ता था.जिस स्टोर की तरफ़ कोई देखता तक नहीं था- उधर सब का आना- जाना लगा रहता. कुछ सामान रखा जाता, कुछ निकाला जाता और ना जाने क्यों इन सब में हमारी दिलचस्पी कुछ ज़्यादा ही रहती. स्कूल से आकर झटपट कपड़े बदल, खाना खा कर हम सब स्टोर के दरवाज़े पर लटक लेते- क्या मालूम कौन सी इंट्रेस्टिंग चीज़ मिल जाए! हम सब को स्टोर रूम में अकेले जाते हुए बहुत ड़र लगता था- कुछ ना कुछ कर के हम उधर का काम टाल देते थे. कभी मजबूरी आन पड़ती तो भैया हम सब इकट्ठे ही जाते. अब किसी ने सही तो कहा है की एकता में ही बल है. ना, ना ग़लत समझे आप! मैं बाजू वाले घर की एकता की बात नहीं कर रहा हूँ- वो तो बहुत कमज़ोर सी है, मैं हम सब के साथ होने की बात कर रहा हूँ.
स्टोर रूम में अकेले जाने की हिम्मत नहीं होती थी- ऐसा नहीं था वहाँ कोई भूत-चुड़ैल रहते हैं पर अंदर का माहौल कुछ डरावना सा लगता था. बिजली की खपत कम हो इसलिए अंदर एक मरियल- सा, अपने जीवन से दुखी पीला बल्ब इतने बड़े स्टोर को रोशनी देने की कोशिश में दिन-रात लगा रहतावहीं स्विच के पास बने हुए आलों में भिन्न- भिन्न तरह की चीजें रखी रहती- जैम और रूहफ़जा की ख़ाली बोतलें, छोटे टिन के डिब्बे, रस्सियों के गोले, कुछ टूटी-फूटी मकड़ियों के जाले से सजी हुई चीज़ें. हमारी कोशिश ये रहती की कुछ भी हो जाए पर हम अपने हाथ को गलती से भी उन आलों तक ना पहुँचने देंगे. इसलिए बड़ी सावधानी से हम बत्ती जलाते और स्टोर का अच्छी तरह से अवलोकन करते, अब जाँच- पड़ताल करने में क्या बुराई है!
ये तो स्टोर की एक तरफ़ की कहानी है, दूसरी तरफ़ पर तो पूरी फ़िल्म ही बन सकती है! उधर पुराने रद्दी अख़बारों और पत्रिकाओं का ढेर लगा रहता जो कबाड़ी वाले के इंतज़ार में दिन प्रतिदिन “कम्प्लेन चाइल्ड” से ग्रो कर रहा होता. हमें ये कहने को मन करता की अरे भई, कहीं ये ढेर बच्चे से सीधा बड़ा ना हो जाए- कृपया कबाड़ीवाले को बुला के इसे गुड्बाई कर दीजिए!
पर ये बात मन में ही रह जाती.
चलिए, अब आगे चलते हैं. कोई दस कदम आगे और तीन लम्बे -लम्बे आले जिन में हमारी पुरानी किताबों और कापियों का संग्रह होता! हम तो पास हो गए पर ये सब कब यहाँ से पास होंगी इसका जवाब सिर्फ़ दादी के पास ही होता.

“ इतनी क्या जल्दी है ये किताबें निकालने की! किसी के काम आ जाएँगी.”

इक्स्क्यूज़ मी दादी लगता है हमारे बच्चों के काम आएँगी! ये शब्द सिर्फ़ दिल में रह जाते पर डर के मारे ज़ुबान पर ना आ पाते.
इन आलों को आधा ढक रखा होता माँ के बड़े से लोहे के संदूक ने जो उनके संग शादी में आया था.ये संदूक कोई ख़ज़ाने से कम नहीं था- कितनी सुंदर चीजें होती थी जिनके दर्शन करना काफ़ी कठिन था.ये बेचारा संदूक पूरे साल दुनिया का तो नहीं पर गद्दों और दरियों का बोझ ज़रूर ढोता और सर्दियों में रज़ाइयों और मोटे-मोटे कम्बल को भी लाद दिया जाता इस मासूम पे!

बरसात में कभी-कभी जब यहाँ पानी टपकता तो पोस्ट्मन के ख़ाली कनस्तर रख दिया जाते और गर्मियाँ शुरू होते ही छत की मरम्मत भी की जाती.


दीन-हीन से स्टोर का सफ़ाई अभियान साल में सिर्फ़ दो चार बारी ही होता और इस में रखी कुछ चीजें तो एक ही सीज़न में ताजी हवा में साँस ले पाती.
उस लिस्ट में सबसे पहले नाम आता महीनों से धूल-धूसरित,मकड़ियों के जालों से सजा जंग लगे दरवाज़ों वाला नीले पैंट किया हुआ कूलर का! जब ये मटमैले रंग का कूलर हमारे घर आया था तो इसकी शान कुछ अलग ही थी- हर इतवार को इसका पानी निकाला जाता और अच्छे से सफ़ाई की जाती. इसकी तीन तरफ़ लगी हुई खस की पट्टियों वाले दरवाज़ों को धूप में रखा जाता, गीले कपड़े से सब साफ़ कर उसे फिर बरामदे में लगी खिड़की में फ़िक्स किया जाता. कहीं से भी गर्म हवा अंदर ना आ सके तो आस पास के गैप में पुराने अख़बार घुसा  दिए जाते. अब इतने बड़े कमरे को ठंडा करने का बोझ इस कूलर के नाज़ुक कंधों पर ही था!


जैसे ही पिताजी बटन ऑन करते हम सारे ठंडी हवा का आनंद लेने के लिए कूलर के सामने खड़े हो जाते. कितनी भीनी-भीनी ख़ुशबू आती, मन करता बस वहीं खड़े रहें. इतने में दादी के प्रवचन शुरू हो जाता “कमबख़्तों, सामने से हटो. मुँह घुस लिया कूलर में. बीमार पड़ जाओगे. आराम से चटाई पर बैठ कर खेलो!”
इस कूलर ने ना जाने कितनी गर्मियाँ हमारे साथ बितायीं-जब बिल्कुल ही साथ ना दे पाया तो स्टोर के एक कोने में रद्दी सामान के साथी बन गया.
अब तो सारे घर में ऐर- कंडिशनर ही है पर इसकी हवा में वो खस और केवड़े की भीनी सुगंध नहीं जो हमें हमारे बचपन के उन बेफ़िक्र, निश्चिंत दिनों में फिर से ले जाए.

4 comments:

  1. बहुत ख़ूबसूरत लिखा है बिंदु. वाक़ई हर बात बचपन के उस दौर की सैर करा देती है तुम्हारी.

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  2. बहुत ख़ूबसूरत लिखा है बिंदु. वाक़ई हर बात बचपन के उस दौर की सैर करा देती है तुम्हारी.

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