Wednesday, October 18, 2017

दिवाली

जैसे-जैसे दिवाली नज़दीक आती हम बच्चे बहुत ख़ुश होने लगते, आख़िर यह त्योहार था ही इतना स्पेशल! दादी और माँ बनवारी काका को बुला कर सारे घर के सफ़ाई करवाती।घर के कोनों में बने जाले हटवाना,आँगन की धुलाई, छज्जों पर पड़े पीपल के सूखे पत्ते हटवाना,धूल-धूसरित हुए रोशनदानों की सफ़ाई,पंखों पे जमी पिछले छह महीनो की गर्दी, खिड़कियों की जाली की सफ़ाई और ना जाने कितने काम। बनवारी काका काम में एकदम चुस्त थे - बिजली की फुर्ती से काम करते थे। पर उनकी इस बिजली को चलाने के लिए बस पाँच -सात कप चाय चाहिए होती थी! इस बात से दादी को बहुत ग़ुस्सा आता था।"कितनी ज़्यादा चाय पीता है ये मरा बनवारी।दूध का सारा ब्योंत ही ख़राब कर देता है।"

दिवाली के पंद्रह दिन पहले ही दादी सफ़ेदी वालों को बुलावा कर घर का टच- अप भी करवा देती थी।स्टोर से चूने के कनस्तर मंगवाती और अपने सामने ही उसमें नील मिलवाती- और यही रंग घर की दीवारों के मेकअप के काम में आता।बिलकुल बढ़िया,सस्ता, सुंदर और टिकाऊ! अब अगर हर घर कुछ कहता है तो हमारे घर की दीवारें ज़रूर मेरी दादी कंजूसी के बारे में बातें करती होंगी!


इनके बाद नम्बर आता घर के कबाड़ का- अख़बार, डालडा के ख़ाली डिब्बे, कनस्तर, स्कूल की पुरानी कापियाँ और किताबें,ऑरेंज स्क्वॉश और रूहफ़जा की बोतलें, बन्नो बुआ की ढेर सारी फ़िल्मी मैगज़ीन, माँ की सरिता और गृहशोभा और पिताजी की इंडिया टुडे। कबाड़ीवाले से मोलभाव करने में तो दादी का कोई सानी नहीं था।"ये क्या भाव लगा रहा,हमें क्या चीज़ें मुफ़्त में मिलती हैं? सही भाव लगा नहीं तो किसी और को दे दूँगी और मुझसे होशियारी करने की तो सोचियो भी मत। तराज़ू में बराबर से तोलना!" बेचारा कबाड़ वाला, सामान से ज़्यादा दादी की डाँट अपने साथ ले कर जाता।अब दादी के इस स्वभाव से तो हर कोई अच्छे से वाक़िफ़ था।
गोदरेज की भारी भरकम अलमारी को हिलाने के लिए तो कोई दमदार आदमी ही चाहिए रहता था।इसके लिए बुलाया जाता सुधीर चाचा को- वो पहलवान जो थे! जैसे ही चाचा अलमारी हिलाते हम फ़टाक से उसके पीछे चले जाते अपनी खोयी हुई चीज़ों को ढूँढने।जहाँ हमें अक्सर हमारे खोए हुए खिलौने मिल जाते और कभी- कभी कोई भटकती हुई चवन्नी या अठन्नी मिल जाती तो हमारी चाँदी ही हो जाती।

माँ के साथ बाज़ार जाने के लिए तो हम एवररेडी रहते- पता था वहाँ जा कर दिवाली की रौनक़ देखेंगे और यदि माँ का मूड अच्छा हुआ तो गोलगप्पे और आलू की चाट भी खाएँगे। मिट्टी के दीये,खिलौने,सुंदर से गणेश-लक्ष्मी, कंदील, रंग-बिरंगे काग़ज़ के झालारें ,खील पताशे, पटाखे और अपनी पसंद के कपड़े लेकर घर आते।दादी और माँ के हाथ के बने बेसन और बूंदी के लड्डू, मावे की बर्फ़ी, गाजर का हलवा, कचौरी,मठरी, नमकेपारे, गुझिया और दिवाली का स्पेशल खाना ही हमारी दिवाली को कितना जगमगा देता था...



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