Saturday, September 23, 2017

मेहमान

कैसे भूल सकती हूँ वो दिन - सुबह से पूरे घर में हलचल मची हुई थी। इतनी भागम भाग की कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था। मानो सब के सब ज़रूरत से ज़्यादा बिज़ी है.किसी के पास फ़ुर्सत ही नहीं की दो मिनट रुक कर बात तो कर ले!सब इतने ज़्यादा व्यस्त की हमारी बदमाशियों को भी नज़रन्दाज करा जा रहा था।हम सब इस सोच में डूबे थे कि आज हमारे घर में इतना कोहराम क्यूँ मचा हुआ है।इतने सारे सगे सम्बंधी क्या कर रहे हैं घर पर ।माँ से पूछने की कोशिश की तो माँ ने अपनी बड़ी -बड़ी आँखें दिखाकर धमका दिया! बच्चे हैं तो क्या हुआ, आख़िर सेल्फ़- रेस्पेक्ट भी कोई चीज़ होती है।अपना सा मुँह ले कर हम इधर-उधर हो लिए।


मौसाजी अपनी ऐम्बैसडर गाड़ी को चमकाने में लगे हुए थे और मौसियाँ अपनी सुंदर साड़ियों में सज कर एक-दूसरे से गप्पें मार रहीं थी। बस सब कुछ बहुत हैपनिंग सा लग रहा था।अब रसोईघर की तरफ़ देखा तो अम्माँ भी एक के बाद एक निर्देश दिए जा रहीं थी। स्वादिष्ट व्यंजनो की ख़ुशबू से पूरा घर महक रहा था। चुपके से झाँका तो गरमा गरम कचौरी, समोसे, दाल का हलवा, केले की सोंठ, दही-भल्ले और बहुत कुछ मेज़ पर तैयार रखा हुआ था।सब कुछ हमारी पसंद का, पर अफ़सोस हमारी पहुँच से कोसो दूर !

काम वाली बाई का तो शायद आज स्पेशल डाँट दिवस था। झाड़ू-पोंछा ठीक से ना लगाने की वजह से अम्माँ से ख़ूब करारी डाँट खाने को मिली उसको।फिर आया हमारा नम्बर।सुंदर- सुंदर कपड़े और तेल से चमकते बालों में हम भी किसी स्टार से कम नहीं लग रहे थे।

इतने में पिताजी ने आवाज़ लगाई," क्या सब तैयार हैं ?" एक आवाज़ पड़ते ही पूरा का पूरा ख़ानदान गाड़ियों में भर कर पालम हवाई अड्डे की और रवाना हो गया. अब रोज़ -रोज़ थोड़ा ही विदेश से मेहमान आते हैं और ऐसे मौक़े मिलते हैं सजने के और बढ़िया खाना खाने के.

पाँच साल बाद मामा आए थे-सबके लिए ख़ूब सारे तोहफ़े और प्यार लेकर ...


और मेरे लिए नीली आँखों और सुनहरे बालों वाली गोल -गोल घूमने वाली प्यारी सी गुड़िया...

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बचपन की मिठास

हमारे घर के पास के बहुत बड़ा पीपल का पेड़ था और बग़ल में सुरेश हलवाई की दुकान थी- एक तरफ़ विशालकाय कड़ाई में दूध उबलता रहता और दूसरी तरफ़ वो...