Wednesday, October 11, 2017

गरमियों का मनोरंजन

हमारे दादजी बहुत बड़े वक़ील थे इसलिए घर पर अक्सर बहुत सारे लोग आया जाया करते थे।ऐसा जान पड़ता था की घर, घर ना हो कर एक धर्मशाला है- जिसे देखो वो ही चला आ रहा है, कभी कोई एक दिन रुकता तो कोई दो दिन।कुछ तो हफ़्ता-दस दिन से पहले दरवाज़े की शक्ल भी ना देखते थे ।अब ऐसे मुफ़्तख़ोरे हमें बहुत बुरे लगते पर हम कुछ नहीं कर भी नहीं सकते थे।गरमियों की छुट्टियाँ चल रही थी और हम सब घर में में क़ैद! दादी ने बाहर खेलने के लिए बिलकुल मना कर दिया था।" नाक में दम कर रखा तुम बच्चों ने।अब इतनी गरमी में खेलने जाओगे,लू लग जाएगी।"

हम जब कमरे की तरफ़ जाने लगे तो देखा की बग़ल वाले कमरे में राजू मामा सो रहे हैं।यह कब आए! शायद देर रात को आए होंगे।हमें इन मामाश्री से कोई ख़ास लगाव नहीं था- अव्वल दर्जे के मुफ़्त खोर और कंजूस थे! इनकी जेब से कोई चवन्नी भी नहीं निकलवा सकता था। उन्हें देखते ही हमारे दिमाग़ की क्रॉस- वाइरिंग में एक स्पार्क उठा! शैतान खोपड़ियाँ ऐक्टिव हो गयीं! चलो, आज दोपहर के मनोरंजन का प्रबन्ध तो हो गया।अब क्या और कैसे करना है, वो सोचना पड़ेगा।

सबकी नज़रें बचा कर हम उस कमरे में दाख़िल हुए जिसमें श्रीमान राजू मामा आराम फ़रमा रहे थे।मई की तपती गरमी में घरघराते पंखे को मामा की ख़र्राटों का साथ मिल गया था- दोनों जुगलबंदी कर रहे थे! यही सबसे बढ़िया मौक़ा था।मैं लपक कर माँ के कमरे में गया। उनकी नज़रें बचा कर जैसे ही दराज़ खोला, माँ एकदम बोली, "क्या ढूँढ रहा है? तेरे तो कोई सामान यहाँ नहीं है!" तुरंत हथेली पर सरसों जमाते हुए कहा," माँ, बन्नो बुआ को कहीं जाना है, आपकी लिप्स्टिक मँगवाई है।"



फिर वहाँ से सीधा गया मामा के कमरे में और अपनी कलाकारी शुरू कर दी। दीपू ने मामा को बड़ी से लाल बिंदी लगाई, चुन्नू ने काजल, बिट्टू ने माँ की लाल लिप्स्टिक और मैंने उनके बाल सँवार के दो प्यारी -प्यारी चोटियाँ! मामा नींद के आग़ोश में थे और हमारी करस्तानी का उनको कुछ पता भी ना चला।हम जैसे ही कमरे इस निकले, इतने में दादाजी ने राजू मामा की ज़ोरदार आवाज़ लगाई ।मामा घबरा कर उठे और बिना अपनी शक्ल सूरत और कपड़े सँवारे पहुँचे दादाजी के कमरे में।दादाजी ने जैसे उन्हें देखा तो बोले,"यह क्या हुलिया बनाया है? कोई नौटंकी चल रही है क्या?"

मामा ने आइना देखा तो भौचक्के रह गए! वो हमारी इस करस्तानी को जान गए।
उनके बाद आया हमारा नम्बर।हाजरी के बाद, सीधा सज़ा ही सुनाई गई।अपना केस लड़ने का मौक़ा भी ना दिया गया हम मासूमों को !

4 comments:

  1. It has become a habit to read your stories everyday before touching bed. Very well written

    ReplyDelete
  2. Mischievous kids. This kind of entertainment is worth every effort.

    ReplyDelete
    Replies
    1. Trust me it was.We have actually done something very similar!

      Delete

बचपन की मिठास

हमारे घर के पास के बहुत बड़ा पीपल का पेड़ था और बग़ल में सुरेश हलवाई की दुकान थी- एक तरफ़ विशालकाय कड़ाई में दूध उबलता रहता और दूसरी तरफ़ वो...