Friday, October 6, 2017

झूठ के चार पैर

अब हम उसे किसी तरह से घर तो ले आए पर डर के मारे हम सब की जान निकल रही थी।सोच- सोच कर दिल डूबा जा रहा था की किसी को भी अगर भनक लग गयी तो हमारा क्या होगा! सबसे ज़्यादा डर तो हमें बन्नो बुआ का था पर हम ने ठान लिया था की उसे वापिस तो नहीं करेंगे, चाहे कुछ भी हो जाए।और फिर जनाब जब ओखली में सिर दिया तो मूसलों से क्या डरना!

अब कहाँ रखेंगे, कैसे रखेंगे, किस की ड्यूटी लगेगी, कौन ज़िम्मेवारी लेगा जैसे अनगिनत प्रश्न हमारे दिमाग़ की स्क्रीन पर चमकने लगे।पर जनाब, यह कोई कौन बनेगा करोड़पति नहीं चल रहा था की जवाब दो और इनाम पाओ! उत्तर खोजना भी आसान नहीं था और फिर अपने पास ना तो कोई लाइफ़् लाइन,ना ही कोई ऑडीयन्स पोल और ना ही कोई फ़ोन-अ-फ़्रेंड!

ये कोई बहुत बड़ा नहीं पर छोटा, हल्का-फुल्का सा मसला था लेकिन उसका परिणाम बहुत बड़ा! हम सबने सोच - विचार करने में बहुत वक़्त लगाया तब जाकर एक रास्ता नज़र आया।क्यों ना एक -दो दिन के लिए उसे दादी के ऊन की टोकरी में रख दे बाद में सम्भाल लेंगे।सबसे सुरक्षित स्थान है वो।किसी तरह हिम्मत करके उसे छिपा तो दिया पर झूठ के पाँव नहीं होते! पर इनके थे और वो भी चार!

यह सुंदर, सफ़ेद झबराए बालों वाला पिल्ला टोकरी से निकल कर सीधे हमारे घर के मुआयने पर निकल पड़ा, जैसे यह इस इस्टेट का मालिक हो! इससे पहले की हम सब कुछ कर पाते यह जनाब सीधे पहुँचे रसोईघर में और सबसे पहले मुँह मारा दूध की पतीली में! फिर क्या, घर में कोहराम मच गया और फिर हमारी हालत तो कुत्ते से भी बुरी. ऐसी पिटाई हुई की एक हफ़्ते तक शरीर सूजा रहा।


इस कांड का ऐसा असर हुआ की हमने गली के हर कुत्ते से मुँह ही मोड़ लिया।

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