Friday, October 6, 2017

बचपन का स्वाद

हम क्लास में आते ही सबसे पहले अपने- अपने लंच बॉक्स निकाल लेते थे. इसलिए नहीं क्योंकि हमें भूख लगी होती थी, पर इससे हमें एक दूसरे के डिब्बों में झाँकने का मौक़ा मिल जाता था. फिर सही पिक्चर सामने आती थी! कौन क्या लाया है- आलू का पराँठा,छोले चावल,जैम ब्रेड, नूडलेस, पूरी,कचौरी, इडली-डोसा, पोहा और ना जाने क्या-क्या आता था हमारे डिब्बों में!


जिसका खाना सबसे ज़्यादा मज़ेदार होता वो सबसे पहले सफ़ाचट होता. सबसे बोरिंग खाना सबसे आख़िर में.जिसके पास सबसे स्वादिष्ट खाना होता था वो बड़ी मुश्किल से मिल- बाँट कर खाने के लिए हाँ करता.अब सोचने की बात है की कौन अपना पसंदीदा खाना किसी और के साथ बाँटना चाहता है! पर कुछ महा कंजूस तो अपने खाने के डिब्बे को देखने भी नहीं देते थे और कुछ इतने दिलदार की अपना खाना ख़त्म होते देख ख़ूब ख़ुश होते। इसलिए ताकि वो जाकर कैंटीन से मज़ेदार, चटपटी चीज़ें खा सके।

कभी -कभी ऐसा भी होता की कोई अपना डिब्बा भूल जाता था- फिर क्या सब के सब परेशान हो जाते।खाने की घंटी बजते ही सब अपने -अपने डिब्बे लेकर उसके पास आ जाते।"तू आज खाना नहीं लाया क्या?कोई बात नहीं, ले मेरे में से खा ले "। फिर क्या तरह-तरह के खाने उसके सामने परोस दिए जाते - कोई उसे आलू का पराँठा देता,तो कोई इडली,पोहा,सैंड्विच,मठरी, नूडलेस, बिरयानी और ना जाने क्या -क्या। आख़िर दोस्त को भूखा कैसे 
रहने दें!



स्कूल बंद होने से पहले जिसके पास पैसे होते वो कैंटीन से समोसे और चिप्स लाता और फिर सब मिलकर खाते। बस में चढ़ने के पहले नुक्कड़ पर खड़े बूढ़े शर्माजी से आम पापड़, चूरन,खट्टी इमली,नारंगी और कोला गोली,राम लड्डू ख़ूब मज़े से खाते।


याद करता हूँ तो बचपन के इन चटकारों का स्वाद आज भी ज़बान पर ताज़ा हो जाता है!

4 comments:

  1. Bahut achcha likha. Mujhe bhi bachpan ki yaad dila di tumne.

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    1. Thanks Praveen. It is a trip down the memory lane- bringing back happy memories from our childhood and sharing with others.

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  2. Yes indeed these stories remind us of our childhood. Very well written.

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