Saturday, October 7, 2017

रोज़ का खाना

हमारे यहाँ रोज़ वही नाश्ता तैयार होता था, जो हम सब को महा बोरिंग लगता था।
क्रीएटिविटी नाम की तो कोई चीज़ ही नहीं थी! स्कूल ले जाने के लिए वही नमक-अजवाइन के पराँठे और निम्बू का अचार, बहुत हुआ तो ब्रेड और जैम ( वो भी सेब का !) या कभी -कभी मटर पुलाव।हमने शिकायत की तो दादी से कितनी बातें सुनने को मिली, बन्नो बुआ तो हमें बिगड़ैल कह कर बुलाने लगी और माँ का तो लगता था जैसे बल्ब ही फ़्यूज़ हो गया है।अब दिल की बात कहते भी तो किससे!

हम सोचने लगे की हमारे इस नीरस भोजन को हम कौन से रस से प्रेरित करें- ताकि यह मज़ेदार हो जाए।अब पिज़्ज़ा,पास्ता के बारे में तो हमें कुछ ज्ञात नहीं था।अजी, हमने तो इनके नाम भी अभी सुने हैं-उस समय घर में इसका ज़िक्र करते तो ज़रूर दादी के डंडे पड़ते। हम सब ने मिलकर सोचा की चलो सर्वे करते हैं की कौन कौन सी नई चीज़ें आयी हैं परचून की दुकान में, जो हमारे स्वाद के टक्कर की हैं।हम पहुँचे बंसल जनरल स्टोर - जहाँ काँच के जार में रखी हुई टोफ़ियाँ, कैरमल और ऑरेंज की गोलियाँ,बबल्गम और बिस्कुट हमें अपनी ओर आकर्षित करने लगे।

लेकिन हम तो कुछ और ही ढूँढने आए थे - इन छोटे-छोटे प्रलोभनो को ताक पर रख कर जैसे हम आगे पहुँचे, अंकलजी बोले,"पिंटू यह तेरे लिए रखी है, कुछ नया आया है मार्केट में। ट्राई करके तो बता कैसा है !" झट से उन्होंने मेरे हाथ में पीले रंग का एक पैकेट रख दिया।उसे घर जा कर खोला तो मैदा के लम्बे लम्बे गुच्छे, जिसे देखते ही दादी बोली, "कंबख़्तों ,यह क्या कीड़े से लिए हो? कल उस बंसल की जाकर ख़बर लूँगी, बच्चों को ख़राब चीज़ पकड़ा दी।"

अब उस पर लिखे निर्देश अनुसार हमने टुकड़े करके उसके संग आए मसाले के साथ उबलने रख दिया। "सिर्फ़ दो मिनिट", यही तो लिखा था मैगी के पैकेट पर! हम उबालते रहे यह सोच कर की यह तो अभी कच्ची है और पता भी ना चला की कब वह नूडलेस से खिचड़ी में तब्दील हो गयी है और हमारी जगह पतीले ने उसके स्वाद का आनंद भी ले लिया है।

और जो बची-कुची प्लेट पर आयी वो इतनी बेस्वाद कि उसे हमसे ज़्यादा कचरे के डिब्बे ने एंज़ोय किया...


3 comments:

  1. Very true. Looks like it is my own experience. Sanjeev Diwan

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  2. We went through the same experience- where Maggi was outrightly rejected by us and elders both!

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  3. बचपन की यादें ताजा हो गईं।

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