Saturday, November 3, 2018

गाथा गुसलखाने की

हम गुसलखाने में घुसे नहीं, दादी का प्रोग्राम तुरंत चालू हो जाता था।“ ओ, पिंटू अंदर जा के ब्याह मत जाइयो, फटफट नहा कर आना!” अब दादी को कैसे समझाते की सर्दी के मौसम में गरम पानी से स्नान करने का मज़ा कुछ अलग ही होता है। गरम पानी से निकलती हुई स्टीम हमारे मकड़ी के जाले से सजे और  धूल धूसरित गुसलखाने को थोड़ा- थोड़ा स्टीम रूम बना देती! वही कोने में लकड़ी के त्रिकोण पर रखा सरसो का तेल,संसिलक शैम्पू, हमाम साबुन, नयसिल पाउडर और पापा का शेविंग का सामान हमारे कारनामों के मूक दर्शक होते। हम भी पूरी प्लानिंग के साथ अंदर जाते।अब अंदर जाएँगे और थोड़ा बहुत वक़्त भी लगाएँगे और अपनी बेसुरी आवाज़ में मोहम्मद रफ़ी साहब या फिर किशोर दा के नग़मे भी गाएँगे।
हमारी ख़ुशी से कोई ख़ुश नहीं होता था.बन्नो बुआ को तो मौक़ा चाहिए होता था हमें दादी से डाँट पड़वाने का. जैसे ही तौलिया ले कर आता वैसे ही बन्नो बुआ शुरू हो जाती, “ पिंटू अंदर जा कर बैठ मत जाना जल्दी- जल्दी करना, मुझे बबिता के साथ बाज़ार जाना है.” छाछ बोले तो बोले, छलनी भी! पर हम कौन से सुनने वालों में से थे, बात सुनी भी और नहीं भी।
बाहर आँगन में बड़ी ऐल्यूमिनीयम के जम्बो पतिले में पानी गरम होता और वहाँ दादी की हिदायतों की लिस्ट लम्बी होती। ये तो नॉट हैपनिंग था, पर क्या करे दादी से पंगे लेना बेहद ख़तरनाक काम था। कितनी बार मन होता की दादी को बोल दे की ये पानी है राशन नहीं, पर अब जो मिल जाए उसमें ही संतुष्ट होने की भरपूर कोशिश  करते।
लेकिन, गुसलखाने में अंदर जाकर वो ऊधम उतारते की घरवाले परेशान हो जाते।अब यही तो वो जगह थी जहाँ हम अपनी मनमानी कर सकते थे।दादी की कंजूसी की वजह से हम काफ़ी क्रीएटिव हो गए थे और एक बालटी गरम पानी को दो में कैसे बदला जाता है वो हमें अच्छे से आता था! कभी- कभी तो एक का ढाई भी कर लेते थे!
अभी पानी की ठीक से जाँच -पड़ताल भी नहीं करी होती, इतने में आवाज़ें आनी शुरू हो जाती। “ ज़्यादा देर गरम पानी से अपना शरीर मत सेंकना काला हो जाएगा, कोई छोरी ना ब्याह करेगी तुझ से!” इक्स्क्यूज़ मी दादी, मैं कोई डबल रोटी का स्लाइस नहीं हूँ, जो ज़्यादा टोस्ट हो जाएगा और शादी उसके लिए बहुत छोटा। ये बातें दादी को बोलने की हिम्मत नहीं होती और सब दिल के एक कोने में रह जाती।
चाहे दादी आवाज़ें लगती या माँ प्यार से पुकारती, गुसलखाने में जा कर तो अपनी मस्ती चालू हो जाती।अच्छे से गरम पानी से अपनी सिकाई करके जब बाहर आता तो दादी की डाँट, बुआ की फटकार, माँ की मार और पिताजी की पिटाई मेरा इंतज़ार कर रही होती!
आज गरम पानी अन्लिमटेड है पर बचपन का वो बेफ़िक्री वाला टाइम नहीं है।

2 comments:

  1. Nice post Bindu I liked the note on which you ended it. It's the reality of today You reminded me of my childhood. Nice one

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