Thursday, October 5, 2017

इंतज़ार

वो हफ़्ते में ३-४ दिन ही आता था, मगर हमारी नीयत तो देखिए हमें उसका हर दिन ही इंतज़ार रहता था।अब कौन समझा सकता था हमें - हम तो भई छोटी-छोटी ख़ुशियों में ही बहुत ख़ुश हो जाते थे।उसके आते ही हम सब बच्चे ऐसे ख़ुश हो जाते थे मानो हमें दुनिया की सबसे नायाब चीज़ मिलने वाली है.कितने सारे ख़्वाब बनाने लगते थे,अब भला ख़्वाब दिखने के पैसे थोड़े ही लगते हैं?

आपस में सलाह-मशवरा करते।कभी कभी झगड़ा और कभी तो इतना प्यार की घरवाले ही चकरा जाते थे! पर उसके आने का असर ही कुछ ऐसा था की सब कुछ मानो ठहर जाता था. कितने उतावाले हो जाते थे हम सब- शायद घड़ी से ज़्यादा हमें उसके आने का पता था. जहाँ घड़ी में दो बजे अपनी छोटी-छोटी मुट्ठियों में पैसे दबा कर, जाली के दरवाज़े पर झूलने लग जाते.कितनी बार तो माँ से डाँट पड़ती पर हमें कुछ फ़र्क़ नहीं पड़ता।यह सिर्फ़ हमारा हाल ही नहीं और बाक़ियों की भी यही कहानी होती।अब मई -जून की गरमी और गली में बच्चे अपने घरों के सामने लटकते हुए दिखायी देते, तो अंदर से आवाज़ पड़ती," कंबख़्तो अंदर आ जाओ। लू लग जाएगी। जब वो आएगा तब मालूम पड़ जाएगा, तुम अभी से क्यों बाहर घूम रहे हो!"

फिर दूर गली के कोने पर उसकी एक झलक पाते ही कितने ख़ुश हो जाते।वो अपनी सफ़ेद-नीली धारियों वाली गाड़ी में तरह- तरह की आइसक्रीम लेकर आता था।उसके आते ही बच्चों में खलबली मच जाती।सब बेसब्री से उसका पीपल के पेड़ के नीचे रुकने का 
इंतज़ार करते। फिर जैसे ही वो गाड़ी का ढक्कन खोलता- बस सबकी फ़रमाइशें शुरू हो जाती। कोई ऑरेंज लेता,तो कोई पाइनैपल, लेमन या रोज़- जितने बच्चे उतनी अलग -अलग पसंद। जिसके ज़्यादा ठाठ होते वो तो सीधा दूध-क्रीम वाली आइसक्रीम लेता। अगर किसी को ज़्यादा पैसे मिलते तो उसकी तो लॉटरी ही लग जाती- फिर तो कसाटा से कम में बात ही नहीं बनती।


सब मज़े ले-ले कर खाते और ख़ूब सारी बातें करते।गरमियों की छुट्टियों की वो लम्बी दोपहर में अपनी मनपसंद आइसक्रीम खाना और बातें करना कितनी ठंडक पहुँचता था...

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