Thursday, October 5, 2017

इतिहास की क्लास

हम इतिहास की क्लास में नींद के झोंके खा रहे थे.कुछ अपनी मेज़ पर ड्रॉइंग कर रहे थे, कुछ ब्लैकबॉर्ड कम और खिड़की के बाहर उड़ते कौवे ज़्यादा देख रहे थे।क्लास में आधे से ज़्यादा बच्चे तो ऊँघते हुए दिखाई दे रहे थे और शायद इसलिए हम इस क्लास को,"सोने की क्लास" बुलाते थे! ऊँघते बच्चों को देख पास बैठे बबलू के दिमाग में एक ख़ुराफ़ाती आईडिया आया।अब उसने तो शैतानियों में जो मुक़ाम हासिल किया हुआ था उस तक तो हम कभी पहुँच ही नहीं सकते थे।इसलिए चाहते ना चाहते हुए हमने उसे अपना गुरु मान रखा था।

हमें भी कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं थी मुग़लों के ख़ानदान के बारे में जानने की।भई हमें कौन सी उसके साथ कोई रिश्तेदारी जोड़नी थी! इसलिए तय किया आज तो कुछ मज़ा किया जाए।फिर जैसे ही बबलू ने इशारा किया, हम भी उसके साथ बदमाशी में शामिल हो लिए।


उसके कहने पर बैग से निकाली हिंदी की नई कापी और सफ़ेद,करारे पन्ने फाड़ने शुरू कर दिए।देखते ही देखते कोई पन्द्रह-बीस बढ़िया हवाई जहाज़ हमारी मेज़ पर सज गए। ऐसा जान पड़ता था की मानो हम एक हवाई अड्डे के मालिक हैं और सारे जहाज़ हमारी मिल्कियत।अब जहाज़ हैं तो उड़ेंगे भी! बबलू और हमने मिलकर जहाज़ बाँटने शुरू कर दिए - कहते हैं ना शेयरिंग इज़ केरिंग!

जैसे ही टीचर ब्लैक्बोर्ड पर लिखने के लिए पलटी,वैसे ही जहाज़ों का टेक-ऑफ़ शुरू! कोई लैंड करा कचरे के डिब्बे पर,तो कोई पढ़ाकू पिंटू के पास, कुछ औंधे गिरे और कुछ ने तो हवाई पट्टी पर ही दम तोड़ दिया. असली तमाशा तो तब हुआ जब हमारे जहाज़ ने अपना रास्ता बदल कर टीचरजी के जूड़े पर लैंड किया! फिर क्या,सारी क्लास हँस-हँस कर बेहाल और टीचरजी ग़ुस्से से लाल!

उस दिन ऐसी धुलाई हुई की हमने फिर कभी हवाई जहाज़ के ख़यालों को भी लैंड नहीं होने दिया!

1 comment:

बचपन की मिठास

हमारे घर के पास के बहुत बड़ा पीपल का पेड़ था और बग़ल में सुरेश हलवाई की दुकान थी- एक तरफ़ विशालकाय कड़ाई में दूध उबलता रहता और दूसरी तरफ़ वो...