Sunday, July 15, 2018

बचपन का स्वाद

अब वैसे तो बन्नो बुआ हमारी फ़ेवरेट नहीं थी पर ऐसे मौक़े पर वो हमारा साथ ख़ूब देती थीं। हम बच्चों के साथ वो भी बच्चा बन जाती थीं। हफ़्ते का सबसे स्पेशल दिन होता था वो जब हम सब शराफ़त से अपना स्कूल का काम कर लेते थे, माँ की रसोई के कामों में मदद कर देते थे और दादी से तो बिलकुल पंगे नहीं लेते थे। अब, दादी ही तो हमारे इस प्रोग्राम की फ़ंडिंग करती थी, तो फिर उनसे उलझने का कोई मतलब हो नहीं बनता था। चुपचाप जो -जो काम वे कहतीं हम कर देते थे और बेसब्री से घड़ी में सात बजने का इंतज़ार करते रहते।ऐसे मौक़े का फ़ायदा तो बन्नो बुआ भी ख़ूब उठातीं।"जल्दी जा और रचना के घर से मुझे पीली ऊन के दो गोले ला दे, वरना शाम को जाने के लिए देर हो जाएगी।" मन तो करता की ना कर दूँ पर मरता क्या नहीं करता। बुआ ने ही तो हम बच्चों को शाम को लेकर जाना है तो उन्हें भला कैसे  नाराज़ कर सकते थे।आनन- फ़ानन रचना दीदी के घर से पीली क्या नीली ऊन के भी गोले ले आता! बस उसके बाद क्या इंतज़ार की लम्बी घड़ियाँ- हम सब कभी कहीं बैठते, तो कहीं लुढ़कते और यही सोचते रहते की साथ बजने में इतने टाइम क्यों लगता है।
फिर जैसे ही सात बजते हम सब तैयार हो कर बुआ के कमरे के बाहर खड़े हो जाते। बुआ जैसे ही हमें देखतीं तो बोलती,"इतनी जल्दी आ गए, अभी तो सात भी नहीं बजे भी नहीं!" हम भी पक्के बेशर्म, अंगद के पैर के जैसे उधर ही जमे रहते।फिर सारी सवारी तैयार हो कर बुआ के संग -संग निकल पड़ती और सीधे जा कर रूकती चौरसिया चाट भंडार पर। उसकी दुकान भले ही छोटी थी पर खाने का सामान देखते ही मुँह से लार टपकने लगती थी। ये बड़े-बड़े सूजी और आटे के गोलगप्पे, करारी पापड़ी, बढ़िया मूँग दाल की पकोड़ी ,गरमागरम आलू की टिक्की और चाट, नरम-नरम भल्ले,आलू की टोकरी, फलों की चाट और ना जाने क्या-क्या। हमारे लिए तो ये कुबेर के ख़ज़ाने से कम नहीं था। अब इतना सब सामने देख कर बहुत कन्फ़्यूज़न हो जाता की क्या खायें और क्या नहीं। फिर आपस में सलाह-मशवरा करके गोलगप्पे से प्रोग्राम को शुरू करते। गोलगप्पे भी ऐसे की जितने खाओ उतने कम, दही भल्ले एक्स्ट्रा सॉफ़्ट और मीठी सोंठ से भरपूर, ख़स्ता आलू की टिक्की के साथ मिलने वाली धनिए-पुदीने की चटनी तो इतनी स्वाद की प्लेट चाटने के साथ साथ डाँट भी खाते थे हम! इतना सब चखने-खाने के बाद पेट तो भर जाता था पर नीयत नहीं। बुआ से मनुहार करके मूँग की पकोड़ियों पर ऐसे झपटा मारते जैसे की कोई शेर अपने शिकार पर पंजा मारता हो- ख़स्ता पकोड़ियाँ पर तीखी हरी चटनी और मूली का लच्छा हमारे को रिझाने के लिए बहुत था! 
कोई ऐसी चीज़ ना हो होती जो हम ना खाते -ये सोचते की अगर पेट ख़राब होगा तो बाद में देखा जाएगा अभी तो जी भर के खा लें।आज भी उन चीजों का स्वाद मुँह में आ जाता है तो बचपन की सारी बातें ताज़ा हो जाती हैं। 



Wednesday, April 4, 2018

मंगलवार का इंतज़ार

हर मंगलवार का हम बेसब्री से इंतज़ार करते थे - शायद औरों के लिए नहीं पर हमारे लिए ख़ास होता था! स्कूल से आकर हम जल्दी- जल्दी अपना होम्वर्क ख़त्म कर लेते ताकि माँ के पास कोई बहाना ना हो हमें अपने साथ ना लेकर जाने का। वैसे तो माँ कभी मना नहीं करती थी पर होम वर्क के मामले बेहद स्ट्रिक्ट थी - अगर काम नहीं करा तो मतलब हमारी हर ऐक्टिविटी निषेध। मंगलवार का दिन दादी का भी ख़ास होता था, वे भी माँ के साथ मिलकर जल्दी से खाने की सारी तैयारी कर लेती। बन्नो बुआ को भी ना चाहते हुए काम करना पड़ता, अब दादी के आगे किसी की भी नहीं चलती थी। "ज़रा जल्दी -जल्दी हाथ चला, काम के वक़्त इतनी ढीली पड़ जाती है, घूमने-फिरने में नम्बर एक।पता नहीं इसकी कामचोरी की आदत कब जाएगी!" बुआ को डाँट पड़ता देख हमें बड़ा मज़ा आता।
शाम को चार बजते ही दादी माँ को हिदायतें देना शुरू कर देती।"जल्दी- जल्दी काम निबटा लेंगे ताकि समय से पहुँच जाएँ, बच्चों को भी तैयार होने को बोल देना वरना घर से निकलने में ही तुम सब लेट हो जाओगे।" अब दादी का हुकुम सर आँखों पर।अब आप सोच रहें होंगे की कोई बहुत बड़े इवेंट के लिए हम सब तैयारी कर रहे होंगे पर उन दिनों तो ये भी एक इवेंट जैसे ही था। हम सब झटपट तैयार हो कर जाली के दरवाज़े पर लटकना शुरू कर देते। उधर दादी,माँ,बुआ सब आनन-फ़ानन अपना काम ख़त्म कर आ जाती और फिर हम सब चल पड़ते अपनी मंज़िल की और। घर से निकलते ही सबसे पहले मिलती चीकू की दादी- जो एक नम्बर की बातूनी। जहाँ दादी को देखा बस वहीं शुरू हो जाती अपने घर के किस्से-कहानियाँ सुनाने के लिए और मंगला चाची को तो अपनी बहू की बुराई करने में सबसे ज़्यादा आनंद मिलता। शिल्पा दीदी बुआ को अपनी कॉलेज की बातें सुनाती और दोनों एक दूसरे के साथ ख़ूब खुसर-पुसर करती। दीपा काकी और माँ अपनी घर -गृहस्थी के बातें करती चलती। और हम सब पूरे रास्ते मस्ती करते चलते, कितना मज़ा आता था!
दूर से मंदिर का केसरिया झंडा दिखाई देते ही दादी हमें बोलती, "जाओ फटाफट जाकर लाइन में लग जाओ, नहीं तो हनुमानजी के ठीक से दर्शन नहीं हो पाएँगे, बहुत भीड़ हो जाएगी।"
दादी का ये कहना और हमारी टोली जा कर लाइन में लग जाती। धीरे-धीरे खिसकते हुए हम आगे बढ़ते, पर भगवान के दर्शन से ज़्यादा हम प्रसाद में मिलने वाले बूंदी के लड्डू का इंतज़ार होता। शायद बचपन से ही हमारी लाइफ़ के फ़ण्डे कुछ ज़्यादा क्लीयर थे! भगवान के आगे हाथ जोड़, पंडितजी से टीका लगवा और प्रसाद में लड्डू पाकर हम अपने आप को किसी से कम नहीं समझते। 
शायद इसी तरह दादी ने हमारा भगवान के साथ कनेक्शन बना दिया- लड्डू तो सिर्फ़ एक बहाना था! 

Thursday, November 2, 2017

बम्बई वाले मामाजी

इस घटना को तो मैं कभी भूल ही नहीं सकता- अजी, जान बूझ कर नहीं करी थी पर पिटाई तो सॉलिड पड़ी थी! हुआ यूँ की मेरी माँ के बम्बई (उस समय मुंबई को इसी नाम से जानते थे!) वाले मामाजी आए हुए थे। खाने-पीने के बेहद शौक़ीन- जहाँ मौक़ा मिला वही खाने बैठ जाते थे।सिर के बालों ने उनका साथ क़रीब-क़रीब छोड़ दिया था पर अपने बचे-कुचे बालों को साँवरने में वो बहुत समय लगाते थे।एक बार जो शीशे के सामने खड़े होते तो उन्हें वहाँ से कोई नहीं हटा सकता था।अच्छी तरह से ख़ुद को जब तक निहार ना लेते तो नहीं उनको चैन ही नहीं पड़ता था।

सज धज कर निकलते रिश्तेदारों से मिलने के लिए और मुफ़्त का खाना खाने के लिए! मामाजी बहुत कंजूस थे, उनके हाथ से पाँच रुपए भी ना छूटते।बस पहुँच जाते किसी के भी घर और अपनी रसभरी बातों में सबको उलझाए रखते। फिर उनके घर से बिना अपनी सेवा करवाए तो निकलते ही नहीं- ख़ूब दबा कर पकवान उड़ाते और कहते रहते,"रहने दे बेटा, अब बुढ़ापे में इतना तला हुआ खाना नहीं पचता।पर अब तू इतने प्यार से खिला रही है तो मैं तेरा दिल भी तो नहीं तोड़ सकता।" यह कहते-कहते ही ५-७ पूरी, कचौरी, बेडमी, हलवा, बादाम का दूध सब डकार जाते! हम सब लोग हैरान होते की इतने पतले दुबले मामाजी की कितनी ज़्यादा कपैसिटी है। लेकिन मामाजी का खाने-पीने का प्रोग्राम यहीं समाप्त नहीं होता वो आन गोइंग रहता!

जैसे मामाजी सुशीला मौसी के घर से निकलते, तो विनोद चाचा के घर का रास्ता पकड़ लेते।"अब दिल्ली आया हूँ तो विनोद से भी मिल लूँ, बहुत दिन हो गए उसे देखे हुए ।" उनके घर पहुँचते ही,"जा बेटा एक ग्लास पानी ले आ और फिर मेरे लिए शिकंजी बना देना- लगता है सुशीला के घर कुछ ज़्यादा ही खा लिया।" शिकंजी का ग्लास मेज़ पर रखा नहीं और मामाजी शुरू हो जाते, "बेटा ख़ाली शिकंजी नुक़सान करेगी, जा कुछ खाने को भी ले आ।" फिर जैसे ही मेज़ पर खाने का सामान आता सूपर फ़ास्ट ट्रेन की तरह खाना शुरू कर देते। हम लोग हैरानी से एक दूसरे का मूँह ताक रहे होते और यह सोचते की इनका पेट है या कुआँ! पर मामाजी को तो किसी बात का कोई फ़र्क़ ही नहीं पड़ता-उनके दिमाग़ में तो आगे की प्लानिंग चल रही होती।

घर से निकलते ही मामाजी माँ को बोलते," देख आज रात को तू ज़्यादा कुछ मत बनाना मेरे लिए- बस ऐसा करना की मूँग की दाल,मेथी के पराँठे, ज़ीरा आलू, हरे धनिए की तीखी चटनी और खीर बना लेना। मुझे रात के टाइम ज़्यादा भारी खाना पसंद नहीं है।" हम सिर खुजाते हुए सोचते की अगर ये हल्का खाना है तो फिर भारी कौन सा होता है! घर आकर माँ ने जल्दी से खाना तैयार कर दिया और हमें विशेष निर्देश दिया की खीर मेज़ पर ठंडी होने के रखी है और हम बिल्ली को उसके पास ना आने दे। हम खेल में मशगूल थे, कुछ सुना कुछ नहीं। अब खीर कब बिल्ली का नैवैद्य बन गयी हमें मालूम ही ना पड़ा! हमने चुपके से झूठी खीर उठा कर रसोई में ढक कर रख दी।

इतने में मामाजी खाने के लिए आ गए- माँ ने उन्हें खाना परोसा तो वो बोले, "बेटा मैं तो सबसे पहले मीठे से शुरू करूँगा, ला मुझे खीर दे दे ।" जैसे ही उन्होंने ठंडी खीर की चम्मच मूँह में डाली, वैसे ही उनके मूँह में आया बिल्ली की मूँछों का बाल! अब ना तो खीर खाते बनी नहीं ही थूकते, बस ग़ुस्से से हमें घूरते हुए कमरे से बाहर निकल गए।और हम ये सोचते रह गए की अगर बिल्ली खीर पहले टेस्ट कर गयी तो इसमें हमारा क्या क़सूर!

लेकिन माँ ने तो कुछ भी सुनने से इंकार कर दिया और ऐसी पिटाई लगाई जो हमें आज तक याद है!

Sunday, October 29, 2017

छुट्टियों का मतलब

वो गरमियों के लम्बे-लम्बे दिन वैसे तो बहुत भारी लगते थे पर जब हम सब साथ होते तो उतने ही मज़ेदार भी हो जाते थे।कितनी बेसब्री से हम पंद्रह मई का इंतज़ार करते थे- क्योंकि वो हमारी गरमियों की छुट्टियों का सबसे पहला दिन होता था।हमारी प्लानिंग होती की ख़ूब देर तक सोएँगे और आराम से दोपहर तक उठेंगे, पर यही हमारी सबसे बड़ी भूल भी होती।सुबह-सुबह दादी की आवाज़ कानों की शांति भंग कर देती,"कंबख़्तों दिन भर सोते रहोगे क्या ? छुट्टियों का मतलब यह नहीं की सारे दिन बिस्तर तोड़ते रहो, जाओ जल्दी से नहाने जाओ वरना पानी चला जाएगा !"

अब दादी को कौन समझाए की छुट्टियों का मतलब है देर से उठना, आराम से नहाना, अपनी मनपसंद चीज़ें खाना, खेलना और ख़ूब मौज -मस्ती करना।एक तरफ़ दादी और दूसरी तरफ़ बन्नो बुआ! हमें घर पर देखते ही उनके सभी कामों की एक लम्बी फ़ेहरिस्त तैयार हो जाती।"तू कम्मो के घर जाकर नई फ़िल्मी दुनिया ले आ और आते आते शगुन के यहाँ से उसका लाल दुपट्टा ले आना, भूलना मत।" अब बुआ से कौन मगजमारी करे, इससे पहले के वो कोई और काम बताए हम चुपचाप वहाँ से निकल लेते।


तैयार हो कर हम गली में निकलते तो वहाँ कोई नहीं दिखता- होता भी कैसे! एक सिर्फ़ हम ही है जिनके घर में उन्हें सुबह देर तक सोने नहीं दिया जाता है, बाक़ी तो बारह बजे से पहले सो कर उठते भी नहीं। ख़ुद पर कितना तरस आता था पर क्या करे- रहना भी तो इसी घर में था। थोड़ी देर धूप में धक्के खा कर आते तो वहाँ से माँ की आवाज़ आती, "छुट्टियाँ शुरू हो गयी और शुरू हो गयी इनकी आवारागर्दी।बस दिन चढ़ते ही गली में घूमना चालू कर दिया।इतना भी नहीं होता की माँ की कोई मदद कर दें ।"

हे भगवान यह गरमियों की छुट्टियाँ तो हमारे जी का जंजाल हो गयीं हैं जिसे देखो वो ही पेनल्टी कॉर्नर से फ़्री किक मार रहा है।

ग़लती से यदि हम रसोई में दाख़िल हो गए फिर तो जैसे माँ के रडार पर आ गए। एक बार दुश्मन जहाज़ भी बच कर निकल सकता है पर माँ की तेज़ निगाहों से बचना, नामुमकिन।"अब समझ आया की पानी की बोतलें कौन ख़ाली रख कर भाग जाता है।और वो फ़्रीज़र में से किसने बर्फ़ निकाली थी? ट्रे में पानी तो मेरी माँ भर कर रखेगी ना। तुम तो सारे दिन बस ऊधमबाज़ी किया करो।" पानी पीना भी एक दंडनीय अपराध हो जाता था।लेकिन हम कौन से कुछ कम थे, जब मौक़ा मिलता पानी के बजाय चुपके से रसना या ऑरेंज स्क्वॉश पी कर भाग जाते- पर हम सारी कारस्तानी पकड़ी जाती। जब जगह-जगह टपके हुए स्क्वॉश पर चींटियों की लाइन मार्च पास्ट कर रही होती तो उसके बाद होता हमारा कोर्ट मार्शल!

दिन की दिक़्क़तों को झेलते हुए शाम तक पहुँचते तो पिताजी से सामना जाता।"सारे दिन ख़ूब मस्ती करी होगी, अब जाओ थोड़ी पढ़ाई कर लो। छुट्टियों का मतलब ये नहीं की किताबों को हाथ ही मत लगाओ, वरना स्कूल खुलते ही इम्तिहान में फ़ेल हो जाओगे।"

हम तो पूरी गर्मियाँ यह समझते रह जाते की सही मायने में छुट्टियाँ कहते किसी हैं!

Tuesday, October 24, 2017

दिलों के तार

वैसे तो ऐसा रोज़ रोज़ नहीं होता था पर जिस दिन होता था उस दिन तो हम सारे कितने ज़्यादा ख़ुश हो जाते थे। हम ही क्या गली-मोहल्ले के सारे बच्चे मानो ख़ुशी से झूम उठते थे।अब ऐसा अवसर रोज़ ही थोड़े आता था कि माँ कहे, "बंद करो ये किताबें और जाओ जाकर बाहर खेलो!" आप भी चकरा गए ना! पर हमारे साथ ऐसा सिर्फ़ उस दिन ही होता था। वैसे तो हमारे कानों पर जूँ भी ना रेंगती थी पर जैसे ही माँ की आवाज़ सुनते तुरंत अच्छे बच्चों की तरह अपनी कापी-किताबें समेट कर अंदर रख देते थे।चेहरे से इतनी मासूमियत टपकती की नन्हें- मुन्ने फ़रिश्ते से जान पड़ते थे।बिलकुल गीता प्रेस की पुस्तकों के अच्छे बालकों जैसे!

जैसे घर की दहलीज़ पर पाँव रखते, वैसे ही बन्नो बस आवाज़ लगाती,"ऐ बंटू, कहाँ जा रहा है? अब जाते-जाते मेरा एक काम कर जा, मुझे ज़रा एक गिलास बरफ़वाला पानी दे जा !" बुआ को भी चैन नहीं है, घर से निकलते हुए टोकना बहुत ज़रूरी है।बिजली की फुर्ती से पानी पकड़ा कर ऐसे भागते की पीछे मुड़ कर भी ना देखते। बुआ का क्या भरोसा, शायद दो -चार और काम बता दे!

जैसे ही गली में एंट्री मारते, पता चलता सारे के सारे बच्चे वहीं जमा हैं और अलग- अलग खेल खेलने की योजना बना रहे हैं। हम फ़टाक से पहुँच जाते ताकि हम अच्छे खिलाड़ियों वाली टीम में शामिल हो सकते।अब फिसड्डी टीम में कौन होना चाहता है- जहाँ सब के सब ढोपरशंख जमा हो। बढ़िया टीम होगी तो हर खेल में बाज़ी मार सकते हैं -फिर चाहे खो -खो,मारम -पिट्टी,पिट्ठू ,लुका-छिपी या ऊँच-नीच का खेल ही क्यों ना हो।टीम तो सॉलिड ही होनी चाहिए बॉस, वरना मज़ा नहीं आता है! यहाँ हम अपनी जुगलबंदी में लगे होते वहाँ सब बड़े धीरे-धीरे घर से बाहर निकल कर एक दूसरे से बातें कर रहें होते।यह समय एकदम पर्फ़ेक्ट होता सभी आंटियों के लिए- अपनी सास की बुराई करने का, एक-दूसरे से रेसिपी माँगने का, नई फ़िल्म की कहानी जानने का और मोहल्ले की गॉसिप सुनने और करने का।अब हर दिन थोड़ी ही इतनी फ़ुर्सत होती है जब मानो ज़िंदगी थम सी जाए और सब धीमी गति से चले।

यह सब उस दिन,नहीं-नहीं उस शाम को होता था जब पूरे मोहल्ले की बत्ती चली जाती थी वो भी बिन बताए! आएगी कब वो तो सिर्फ़ विद्युत विभाग को ही मालूम होता था।पर इस बात से किसे फ़र्क़ पड़ता था - पूरा मोहल्ला एक बड़ा सा परिवार जैसे था।कहीं बातें, कहीं क़िस्से, कहीं कहानियाँ,कहीं बुराइयाँ, कहीं हँसी, कहीं रूठना और मनाना सब साथ-साथ चलता था। वो मिलजुल कर बैठना, वो अनगिनत चाय की प्यालियों के साथ देश की राजनीति पर चर्चा करना, वो शर्माजी के घर से आए गर्मागर्म समोसे उड़ाना, वो बबली चाची के हाथ के बने दही-भल्लों के साथ गॉसिप की चटनी परोसना।

तब बिजली के तारों से ज़्यादा दिल आपस में जुड़े हुए थे और आज, बिजली के तार तो जुड़ गए हैं पर दिलों की दूरियाँ बढ़ गयी हैं।

Wednesday, October 18, 2017

दिवाली

जैसे-जैसे दिवाली नज़दीक आती हम बच्चे बहुत ख़ुश होने लगते, आख़िर यह त्योहार था ही इतना स्पेशल! दादी और माँ बनवारी काका को बुला कर सारे घर के सफ़ाई करवाती।घर के कोनों में बने जाले हटवाना,आँगन की धुलाई, छज्जों पर पड़े पीपल के सूखे पत्ते हटवाना,धूल-धूसरित हुए रोशनदानों की सफ़ाई,पंखों पे जमी पिछले छह महीनो की गर्दी, खिड़कियों की जाली की सफ़ाई और ना जाने कितने काम। बनवारी काका काम में एकदम चुस्त थे - बिजली की फुर्ती से काम करते थे। पर उनकी इस बिजली को चलाने के लिए बस पाँच -सात कप चाय चाहिए होती थी! इस बात से दादी को बहुत ग़ुस्सा आता था।"कितनी ज़्यादा चाय पीता है ये मरा बनवारी।दूध का सारा ब्योंत ही ख़राब कर देता है।"

दिवाली के पंद्रह दिन पहले ही दादी सफ़ेदी वालों को बुलावा कर घर का टच- अप भी करवा देती थी।स्टोर से चूने के कनस्तर मंगवाती और अपने सामने ही उसमें नील मिलवाती- और यही रंग घर की दीवारों के मेकअप के काम में आता।बिलकुल बढ़िया,सस्ता, सुंदर और टिकाऊ! अब अगर हर घर कुछ कहता है तो हमारे घर की दीवारें ज़रूर मेरी दादी कंजूसी के बारे में बातें करती होंगी!


इनके बाद नम्बर आता घर के कबाड़ का- अख़बार, डालडा के ख़ाली डिब्बे, कनस्तर, स्कूल की पुरानी कापियाँ और किताबें,ऑरेंज स्क्वॉश और रूहफ़जा की बोतलें, बन्नो बुआ की ढेर सारी फ़िल्मी मैगज़ीन, माँ की सरिता और गृहशोभा और पिताजी की इंडिया टुडे। कबाड़ीवाले से मोलभाव करने में तो दादी का कोई सानी नहीं था।"ये क्या भाव लगा रहा,हमें क्या चीज़ें मुफ़्त में मिलती हैं? सही भाव लगा नहीं तो किसी और को दे दूँगी और मुझसे होशियारी करने की तो सोचियो भी मत। तराज़ू में बराबर से तोलना!" बेचारा कबाड़ वाला, सामान से ज़्यादा दादी की डाँट अपने साथ ले कर जाता।अब दादी के इस स्वभाव से तो हर कोई अच्छे से वाक़िफ़ था।
गोदरेज की भारी भरकम अलमारी को हिलाने के लिए तो कोई दमदार आदमी ही चाहिए रहता था।इसके लिए बुलाया जाता सुधीर चाचा को- वो पहलवान जो थे! जैसे ही चाचा अलमारी हिलाते हम फ़टाक से उसके पीछे चले जाते अपनी खोयी हुई चीज़ों को ढूँढने।जहाँ हमें अक्सर हमारे खोए हुए खिलौने मिल जाते और कभी- कभी कोई भटकती हुई चवन्नी या अठन्नी मिल जाती तो हमारी चाँदी ही हो जाती।

माँ के साथ बाज़ार जाने के लिए तो हम एवररेडी रहते- पता था वहाँ जा कर दिवाली की रौनक़ देखेंगे और यदि माँ का मूड अच्छा हुआ तो गोलगप्पे और आलू की चाट भी खाएँगे। मिट्टी के दीये,खिलौने,सुंदर से गणेश-लक्ष्मी, कंदील, रंग-बिरंगे काग़ज़ के झालारें ,खील पताशे, पटाखे और अपनी पसंद के कपड़े लेकर घर आते।दादी और माँ के हाथ के बने बेसन और बूंदी के लड्डू, मावे की बर्फ़ी, गाजर का हलवा, कचौरी,मठरी, नमकेपारे, गुझिया और दिवाली का स्पेशल खाना ही हमारी दिवाली को कितना जगमगा देता था...



Tuesday, October 17, 2017

फ़िल्मी चक्कर

अब ये कहानी कितनी फ़िल्मी है ये तो आप ही निश्चित करेंगे- मेरा काम है आपको बचपन की गलियों में एक बार फिर से ले जाना और प्यार में डूबी हुई यादों और क़िस्सों से मिलवाना।

उस दिन हुआ यूँ की घर आते-आते सोनू मिल गया।वो मेरी क्लास में नहीं पढ़ता था और मुझे से दो साल सीन्यर था। वो बिना बात का रौब बहुत झाड़ता था,पर बदमाशियों में मेरा गुरु भी था तो उसकी कुछ बातें मैं देखी -अनदेखी कर दिया करता था।हम सब सोनू को अपना हीरो मानते थे - अब उसके जैसा स्टाइलिश लड़का तो पूरे मोहल्ले में नहीं था। शाम को जब वो अपनी इस्त्री की हुई लाल टीशर्ट, नीली जींस और स्पोर्ट्स शूज़ में निकलता तो उसका रौब अलग ही पड़ता था।कभी - कभी जब वो चोरी से अपने पिताजी का बरूट नाम का पर्फ़्यूम लगा कर आता तो सारी लड़कियाँ उससे बात करने के मौक़े तलाशने लगती।

फिर एक तरफ़ हम जैसे थे जो बाबा आदम के ज़माने की पुरानी निक्कर और पुरानी क़मीज़ में ही घूमते थे। स्पोर्ट्स शूज़ तो दूर की बात हम तो भी हवाई चप्पल भी नहीं पहनते थे।सारा दिन नंगे पैर घूमना और घर आ कर दादी की डाँट खाना हमारा रोज़ का काम था। ऊपर से सरसों के तेल से महकते बाल, कोई लड़की हमारे पास फटकाना भी चाहती तो यह तेल की बदबू उससे हमसे कोसों दूर ले जाती।"सुनो तुम अपनी मम्मी से बोलो केओ कार्पिन का नया तेल आया है, तुम्हारे ले कर आए, उससे ना बालों में से बहुत अच्छी ख़ुशबू आती है ।" अब ग़लती से माँ के सामने ये ज़िक्र कर देते तो इतनी गालियाँ पड़ती की पूछिए मत।"कमबख़्त! सारा दिन लड़कियों के साथ घूमता रहता है। ये साज- शृंगार की बातें कौन बताता है तुझे? तुझे क्या ब्याह करने जाना है ?" मन तो होता की बोल दूँ की माँ अगर तू मेरे बालों में यह सरसों का तेल लगाती रही तो मुझे यक़ीन है की मैं कुँवारा ही मर जाऊँगा। इसकी भयानक बदबू तो किसी लड़की को कभी मेरे पास भी नहीं देती है।

पर पानी में रह कर मगर से बैर, अभी इतनी हिम्मत नहीं थी!

पता नहीं उस दिन माँ ने मुझे सोनू के साथ जाने की इजाज़त कैसे दे दी।अब फ़िल्म जाने के लिए पिताजी से तो पर्मिशन नहीं मिलती तो किसी तरह से माँ को पटा लिया। फ़िल्म देखने के लिए कितना फ़िल्मी ड्रामा करना पड़ा क्या बताऊँ! इमोशंज़ का भरपूर इस्तेमाल किया तब जा कर माँ मानी।यह क़िला फ़तह करने के बाद मैं झटपट तैयार होने चला गया।जैसे ही घंटी बजी मैं भाग कर पहुँचा तो देखा मुझ से पहले पिताजी ने ही दरवाज़ा खोल दिया है और सोनू से ज़्यादा मुझे तैयार देख कर हैरान हो गए।" सज-धज कर कहाँ जा रहा इस समय ?" मेरी तो जैसे बोलती ही बंद हो गयी। इतने में माँ भी वहाँ आ गयीं, पिताजी ने माँ को देखा और मैंने माँ को- मेरा ओवर कॉन्फ़िडेन्स तो देखिये मुझे लगा माँ सम्भाल लेंगी।"मुझे क्या देख रहा है, पता नहीं सोनू और ये क्या-क्या करते रहते हैं दिनभर। अब बता अपने पिताजी को की इसके साथ तू फ़िल्म देखने जा रहा है !"

माँ के डायलॉग ने तो मेरी ज़िंदगी की इस शाम का क्लाइमैक्स ही बदल डाला।उसके बाद पिताजी ने ऐसी धुलाई करी की मैंने फ़िल्म क्या फ़िल्मी सपने देखना भी छोड़ दिया!

बलि का बकरा

हमारे घर के पास एक पीपल का पेड़ था और एक नीम का - फ़र्क़ इतना था कि पीपल का पेड़ घर के बाहर था और नीम का किसी घर ...